Sunday, 18 June 2017

प्रैस विज्ञप्ति 18, जून 2017

प्रैस विज्ञप्ति                                                                                                                         18, जून 2017

जून 2013 आपदा फिर ना होः सावधान हो!!
आपदा की भेंट गये लोगो को भावभीनी श्रृद्धांजलि। आपदा में बांधों की भूमिका को ध्यान में रखते हुये सरकारें बांध कंपनियों पर कार्यवाही करें। भविष्य के लिये सावधानी लें। निगरानी हो

‘‘जून 2013 की आपदा में मारे गये पूरे देशभर से आये तीर्थयात्री और उत्तराखंड के अलग-अलग गांवों में रहने वाले लोग साथ ही वे छोटे बच्चे भी, जो केदारनाथ में जाकर के गर्मी की छृट्टियों में कुछ पैसे कमाने गये‘‘ सभी को हमारी भावभीनी श्रृद्धांजलि है। इस परिप्रेक्ष्य में आज हमें यह याद करना होगा कि अभी तक भी चार वर्ष बीतने के बाद कोंबिंग सही नहीं हुई थी, यह प्रश्न सामने है। आज के सत्ताधारी दल के राज्य अध्यक्ष अजय भटट जी ने इस बात को बार-बार उजागर किया था कि केदारनाथ में अभी भी मृत शरीर हैं। इस समय भाजपा सत्ता में है तो अब उनको वह काम पूरा करना चाहिए।

हमने बांधों के कारण से हुई तबाही पर बराबर लिखा है, मुकदमें दायर किये हैं, लोगों को हक दिलवाये हैं, नदी सुरक्षा पर कार्य हुए हैं; किंतु उत्तराखंड सरकार का और केंद्र सरकार का इस तरफ नजरिया बिल्कुल ही बांध कंपनियों के पक्ष में रहा है।

अलकनंदा घाटी में विष्णुप्रयाग बांध के कारण से नीचे के 7 गांवों में तबाही आयी क्योंकि बांध के गेट बंद थे। विष्णुप्रयाग बांध से उपर खैरो घाटी से ढेर सारा मलवा और पानी आया जो बांध में गेट बंद होने के कारण रूका और फिर धक्के से जब बांध का दाहिना गेट टूटा तो तेजी से बहते उस मलवा और पानी ने नीचे के गांवों की, नदी किनारे की जमीनों को तबाह किया। पाण्डुकेश्वर, गोविंद घाट के हिस्सों को तबाह किया, साथ ही बद्रीनाथ जी को जाने वाला पुल व गोविंद घाट से हेमकंुड साहेब को जाने वाला पुल भी इसी कारण से टूटा है।

मगर इस पर राज्य सरकार या केंद्र सरकार ने कोई जांच नहीं की। माटू जनसंगठन ने विष्णुप्रयाग बांध के प्रयोक्ता जेपी ऐसोसिएट पर मक व मलवे के सही निस्तारण के लिये जो केस दायर किया उस कारण से चमोली प्रशासन व जेपी बांध कंपनी को कुछ कायदे कानून बनाने पड़े और केस के दवाब में स्थानीय लोगो को नदी किनारों की मरम्मत व सुरक्षा दिवार बनाने के ठेके आदि मिल पाये। योजना बनने के बाद भी मक व मलवे का रखरखाव कुछ सही तरीके से हो पाया या नही ये जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की थी। ये कितना हुआ ये जांच का विषय है।

किंतु सरकार ने इस पर कोई संज्ञान नहीं लिया। रिस्तुघाट पीपलकोटी के नीचे भी श्रीनगर बांध परियोजना की वजह से जो श्रीनगर बांध के निचले क्षेत्र में तबाही आयी और जब श्रीनगर बांध आपदा संघर्ष समिति और माटु जनसंगठन की ओर से प्रभावितों के मुआवजे के लिए मुकदमा राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण में दायर हुआ तो राज्य सरकार बांध कंपनी के पक्ष में खड़ी नजर आयी।

मंदाकिनी नदी पर निर्माणाधीन दोनों सिंगोली-भटवाड़ी, फाटा-ब्योंग बांध परियोजनाएं टूटीं, मध्य महेश्वर नदी पर और काली नदी पर जो छोटी परियोजनाएं थीं वे भी टूटीं। इन बाधों केे पर्यावरणीय उल्लंघन के कारण से आसपास के तमाम क्षेत्रों में भूस्खलन आसानी से हो पाया और आपदा में इससे बहुत तेजी से वृद्धि हुई।

माननीय सर्वाेच्च न्यायालय के आदेश पर केन्द्रिय पर्यावरण मंत्रालय ने जो रवि चोपडा जी की अध्यक्षता में कमेटी बनाई, उसकी संस्तुति में यह साफ लिखा हुआ है कि इन बांधों की वजह से आपदा में वृद्धि हुई।
पिछले 4 वर्षों से लगातार हम यह बात कह रहे हैं किन्तु राज्य सरकार और केंद्र सरकार इस बारे में पूरी तरह मौन नजर आती हैं। नमामि गंगा जैसी वृहद परियोजना में भी मात्र गंगा पूजा के लिए घाट कुछ एसटीपी लगाने की योजना है। वह भी ज्यादातर बांधों के डूब क्षेत्रों में लग रहे हैं। बांध कंपनियों पर कोई कड़ी कार्यवाही या निगरानी की बात नहीं नजर आती।

हमने यह बराबर कहा है कि बांधों के पर्यावरणीय नियमों शर्तों के उल्लंघन के कारण पहाड़ कमजोर हो रहे हैं और नदी की पारिस्थितिकी भी बदल रही है, जो भविष्य के लिए, उत्तराखंड के स्थाीय विकास के लिए विनाशकारी सिद्ध होगी है।

2013 की आपदा ने यह सिद्ध किया था कि बांध निर्माण के लिये बाढ़ के कितने भी पुराने आंकडों के आधार पर बांध बनायें, किंतु नदी कब क्या रुख लेगी यह आप पहले से नहीं जान सकते। यह बात स्पष्ट है कि गंगाघाटी पर बने बांधों के कारण से पूरे उत्तराखंड में, पूरे गढवाल क्षेत्र में, गंगा घाटी में तबाहियां आयीं। जहंा बांध नही है वहंा तबाही भी कम हुई है।

भागीरथी घाटी में 2010 से जो लगातार एक के बाद एक हर मानसून में नुकसान हुआ है जैसे कि मनेरीभाली चरण-1, मनेरीभाली चरण-2 के कारण से और टिहरी बांध के कारण से पूरी भागीरथी नदी अब मनेरीभाली बांध के नीचे तो कहीं नजर नहीं आती। देवप्रयाग से ऊपर जहां कोटली में चरण एक-अ बन रहा है मात्र उसके नीचे 17 किलोमीटर तक अभी बहती हुई नजर आती है जिसका भविष्य भी अंधकारमय है।

अलकनंदा व उसकी सहायक नदियों में भी जो लगातार एक के बाद एक बांध बनाने की परियोजनाएं हैं, निर्माणाधीन है वहंा भविष्य में यदि 2013 जैसी आपदा आती है तो उसका क्या परिणाम होगा इसकी कल्पना भी नहीं की सकती।

1978 में जब चमोली जिले में अलकनंदा की विरही नदी में बादल फटने सें आपदा आयी थी 2013 में उससे कम पानी आने पर भी आपदा ज्यादा हुई। यह कल्पना से बाहर होगा कि जब एक इंच भी हिस्सा अलकनंदा का बांध बनने से नहीं छूटेगा तब क्या होगा?

विष्णुप्रयाग बांध के ऊपर में श्री बद्रीनाथ जी के पास 300 मेगावाट, 5 मेगावाट, 10 मेगावाट की परियोजनाओं से लेकर देवप्रयाग तक और फिर देवप्रयाग से हरिद्वार, ऋषिकेश तक बांध परियोजनाएं हैं। लगभग 56 बड़ी बांध परियोजनाओं में से यदि एक भी बांध टूटता है या अन्य कोई घटना घटित होती है तो नीचे का हश्र क्या होगा ?

इस पर कोई भी अध्ययन नहीं है, और जो अध्ययन हुये हैं वे बहुत ही उथले अध्ययन हैं। विष्णुप्रयाग-पीपलकोटी परियोजना में विश्व बैंक ने भी यह कहा कि पूरी परियाजना के अन्य परियोजना के साथ असरों पर यदि अध्ययन किया जाय तो 20 वर्ष लगेंगे। तो क्या राष्ट्रीय नदी गंगा पर बिना अध्ययन के ये परियोजनाएं बना रही हैं? यह टाइम बम हैं।

इसी वर्ष अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया में 13 फरवरी तारीख को 770 फीट के ओरोविल्ले बाँध के स्पिलवे में टूट के कारण 2 लाख लोगों को तुरंत हटाया गया।  नीचे के क्षेत्र में हजारों गाड़ियाँ, घर, संपत्ति का नुक्सान हुआ। जिसकी अनुमानित लागत अरबों में होगी। पर्यावरणीय नुकसान की लागत आंकना मुश्किल है। टिहरी बांध टूटा तो?

प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदर लाल बहुगुणा जी ने बांधों के बारे में आज से लगभग 20 साल पहले कहा था कि हिमालय में बड़े बांध टाइम बम हैं। लेकिन आज यह सिद्ध हुआ है कि टाइम बम का टाइम फिक्स होता है किन्तु इन बांधों के टूटने का कोई टाइम फिक्स नहीं है। ये बड़े बांध कभी भी किसी त्रासदी के कारण बन सकते है।

डबल इंजन वाली सरकार से हम यह मांग करते हैं किः-


ऽ    राज्य सरकार को मृत शरीरों की कॉंबिंग अंतिम शव की बरामदगी तक जारी रखनी होगी। डीएनए टेग सही तरह से हो।
ऽ    आपदा के दौरान की गई लापरवाहियों के जिम्मेंदार अधिकारियों व राजनेताओं पर तथा बांध कंपनियों को उनकी जानबूझ कर की गई लापरवाहियों के लिये दण्डित किया जाये। 
ऽ    सरकार बांध कम्पनियों से इस बात की गांरटी लें कि उनके कारण भविष्य में कोई लापरवाही नहीं बरती जायेगी। श्रीनगर बांध, विष्णु प्रयाग बांध, सिंगोली-भटवाड़ी आदि बांधों के संदर्भ मंे खासतौर से
      इस बात का ध्यान रखा जाये।
ऽ    केन्द्र व राज्य सरकार बांधों के पर्यावरणीय व लोंगों पर पड़ने वाले प्रभावों पर कड़ी निगरानी रखे ताकि भविष्य में ऐसी आपदाओं की पुनरावृत्ति से बचा जा सके।
ऽ    नदियेां को बंाधों, सड़कों व अन्य निर्माण कायों के मलबे का वाहक बनने से रोका जाये। यहंा विष्णु प्रयाग बांध का विशेष संदर्भ लिया जाये।
ऽ    आगे से बांधों से तौबा करके सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा व अन्य स्थायी ऊर्जा स्रोेतों पर काम करे। स्थानीय लोगों की समिति से चलने वाली विद्युत ऊर्जा के लिये प्रयत्न होने चाहिये। स्थानीय लोगों को स्थायी रोजगार मिल सके। जिससे हर युवा और राज्य का हर गांव दमकता रहे।

विमल भाई,         पूरन सिंह राणा,         राजपाल रावत,             बलवंत आगरी 

Saturday, 10 June 2017

प्रैस विज्ञप्ति 10-6-2017

जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, उत्तराखंड

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अब बाँधों का भय कम : पर विरोध जारी रहेगा।

देहरादून | 10 जून, 2017 : संसार भर में बांधों की अनुपयोगिता, दावें झूठे सिद्ध होना, लाभों का कमतर होते जाना, पर्यावरणीय नुकसानों की पूर्ति ना हो पाने, झीलों में गाद भरना, दावे के अनुरूप बिजली उत्पादन न होना, सिंचाई के आंकलन भी कम होते जाना, लम्बे समय के बाद भी जनहक के सवालों का हल ना निकल पाना आदि अनेक ऐसे कारण हुए जिनसे बाँधों में निवेश अब कम हो रहा हैं। उदाहरण के लिए जे. पी. कंपनी कई सालों विष्णुप्रयाग बाँध को एनरौन, टाटा पॉवर आदि को बेचने की घोषणा कर रही है किन्तु अभी तक कोई खरीदार नहीं आया है। अब बड़े बांधों का जमाना धीरे धीरे बीते दिनों की बात हो रहा है। किन्तु हमारी सरकार जरूर बांधों की पैरोकार बनी हुई है। श्री रवि चोपड़ा ने यह बात श्री विमल भाई की नई प्रकाशित पुस्तक ‘मुक्त बहने दो’ के विमोचन के समय कही।

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर बनी जून, 2013 में बांधों के असरो पर विषेशज्ञ समिति के अध्यक्ष रहे, वैज्ञानिक व पर्यावरणविद रवि चोपड़ा ने कहा पुस्तक में लिखे वाक्य ‘विकल्प बांधों का नहीं, इच्छाओं का होना चाहिए’ को उद्दृत करते हुए कहा कि अधिक अधिक बिजली का उपभोग विकास नहीं होता। बिजली का दुरूपयोग कम करना चाहिए। सौर उर्जा एक बेहतर विकल्प हो सकता है लेकिन केन्द्रित रूप में सौर उर्जा का उत्पादन भविष्य में अलग तरह के खतरे पैदा कर सकता है। उन्होंने पुस्तक के लेखक विमल भाई को इस बात की बधाई दी कि उन्होंने बाँधों से जुड़े संघर्ष, विकल्प, ‘अधिक बिजली की मांग’ के तर्कों का खंडन हिंदी भाषा में संकलित किया। इस अवसर पर वरिष्ठ समाजकर्मी श्री पी. सी. तिवारी ने कहा कि सरकार, नीति निर्माताओं व बाँध के पैरोकारों को हम तथ्यों के आधार पर चुनौती देते है किन्तु वे हमेशा नए बहाने लेकर आते हैं।

श्री राजपाल रावत ने विमोचन समारोह का आरम्भ करते हुए, राज्य और राज्य के बाहर से आये साथियों का अभिनन्दन करते हुए यमुना घाटी में बांधों के कारण छीन रहे दलितों के भूमि अधिकार का मुद्दा भी उठाया।

वनाधिकार कार्यकर्ता श्री तरुण जोशी ने कहा कि बांधों में अंधाधुन्द जंगलों की कटान बड़ी कंपनियों को जंगल भूमि देना बदस्तूर जारी है। किन्तु टिहरी बाँध के बाद अन्य बाँध विस्थापितों को राज्य में जमीन नहीं दी जा रही है। सर्वोदयी नेता श्री बीजू नेगी ने कहा कि पौष्टिक फसलों में कम पानी की जरुरत पड़ती है जो बारिश से भी पूरी हो जाती है। उत्तराखंड के विकास के लिए गाँवों में बहुत संभावनाएं हैं। यह झूठा प्रचार है कि बांधों से रोजगार होता है।

विमल भाई ने उत्तराखंड में बांधों के राजनीति पर प्रकाश डालते हुए नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बाँध का जिक्र किया जहाँ मात्र राजनीतिक कारणों से चालीस हज़ार परिवारों को बिना पुनर्वास पीड़ियों से सिंचित गाँव से बेदखल करने के लिए अनेकों बटालियन पुलिस व सेना बुलाने के तैयारी है। 32 वर्ष पुराना संघर्ष आज फिर एक युद्ध का सामना कर रहा है। दूसरी तरफ केंद्रीय उर्जा मंत्री पीयूष गोयल देश में बिजली की बहुतायत बता रहे हैं। उत्तराखंड के सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि बांधों के सवाल पर केंद्र व राज्य की सभी सरकारें हमेशा एकमत रही हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि नमामि: गंगा कार्यक्रम बांधों के सवाल पर मौन है। गंगा बचाने का दावा करने वाली सरकारें भी गंगा का शोषण करने में कहीं पीछे नहीं है। पुस्तक का विवरण देते हुए कहा कि इसमें उनके लेखों के साथ मेधा पाटकर, हिमांशु ठक्कर, सौम्या दत्ता, आलोक अग्रवाल, राहुल पाण्डेय व मंथन संस्था के अध्यन पूर्ण लेख व अकाट्य तथ्य संकलित हैं। हमारी चुनौती है सरकारें उनका जवाब दें।

यह पुस्तिका न केवल बाँध के दावों की पोल खोलती है वरन बाँध विरोधी संघर्षों की जीत, पर्यावरणीय उल्लंघनों पर बाँध कंपनियों पर लगे जुर्मानों, अदालती आदेशों जैसे महत्वपूर्ण विषयों का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। यह बांधों के सवाल पर लड़ने वाले साथियों संगठनों के लिए एक बेहतर संकलन है।  



जबर सिंह वर्मा, शैलेन्द्र भंडारी, ज्ञान सिंह रावत

Monday, 15 May 2017

प्रैस विज्ञप्ति 15-5-2017



लोगो का जीवन खतरे में: बांध कंपनी और सत्ता मौन

16 महिनो से वाडिया संस्थान, देहरादून, उत्तराखंड की रिर्पोट पर कोई कार्यवाही नही हुई। विश्व स्तर की जीवीके कंपनी की सहायक अलकनन्दा हाइड्रो पावर कॉर्पाेरेशन द्वारा अलकनंदा नदी पर बनाया गया श्रीनगर बांध से प्रभावितों पर बांध कपंनी मौन और सरकार सुस्त दिखाई देती है। 
श्रीनगर बांध से विद्युतघर की ओर जाने वाली 3-250 किलोमीटर लम्बी खुली नहर जिसे पावर चैनल कहा जाता है कई स्थानों से क्षतिग्रस्त है। 2015 में मानसून के बाद पावर चैनल के रिसाव के कारण इस चैनल और नदी के बीच रहने वाले मगंसू गांव, जिसमें ज्यादातर दलित परिवार रहते है, के निवासियों का जीवन खतरे मे है। जनदवाब से पूर्व विधायक श्री मंत्री प्रसाद नैथानी ने वाडिया संस्थान को इस पर रिपोर्ट देने के लिये कहा था। रिपोर्ट 30 दिसंबर, 2015 में आ गई। जिसके बाद बहुत से प्रश्न उठे है। जीवीके कंपनी ने वाडिया संस्थान {विग} कि इस रिर्पोट पर क्यों कार्यवाही नही की? पूर्व विधायक श्री मंत्री प्रसाद नैथानी ने 30 दिसंबर 2015 को रिर्पोट आने के बाद सत्ता मे रहने पर भी क्यों कार्यवाही नही की? मंत्री जी मौन क्यों रहे? जबकि रिपोर्ट के निष्कर्ष बहुत ही गंभीर है और सिफारिशेें को तो बिल्कुल ही नजरअंदाज नही किया जा सकता है।

30-12-2015 की वाडिया सस्ंथान की रिर्पोट में की गई सिफारिशेेंः-
ऽ    पावर चैनल के लगभग 200 मीटर विस्तृत क्षेत्र (प्रभावित रिसाव साइट) को वाडिया संस्थान देहरादून के संरचनात्मक भूवैज्ञानिकों के साथ परामर्श के द्वारा पुनः सुदृढ़ बनाया जाना चाहिए।
ऽ    इसके अलावा पावर चैनल के ढ़ाचे के डिजाइन की विस्तृत जांच करने की जरूरत है। जो निम्न तरह की संस्थाओं द्वारा किया जाये जैसे कि- सिंचाई डिजाइन संगठन, रुड़की। इस अभ्यास के दौरान वाडिया संस्थान देहरादून के संरचनात्मक भूवैज्ञानिकों के साथ परामर्श किया जाना चाहिए।
अब नई सरकार को आये हुये भी 75 दिन हो गये है। नये चुने हुये विधायक महोदय श्री विनोद कंडारी जी भी क्षेत्र का कई बार भ्रमण कर चुके है। क्या उनके संज्ञान में यह सवाल आया है। हम इस संदर्भ में मुख्यमंत्री व क्षेत्रीय विधायक से समयबद्ध कार्यवाही की मंाग करते है। 
ज्ञात्वय है कि नहर व नदी के बीच में रहने वाले गांवों की आबादी पहले ही श्रीनगर बांध बनने के कारण अपना खेती का पानी, खेती की जमीन की उर्वता, नदी का पानी, रास्ते खोकर कठिन जीवन जीने को मजबूर है। इनकी जमीन बांध कंपनी अपने विभिन्न कामों के लिये बहुत कम दामों पर, सलाना समझौते की शर्त के साथ लीज़ पर ली थी। अब यह जमीन ज्यादातर बेकार हो चुकी है। कंपनी पैसे भी पूरे नही दे रही। सभी के साथ नई लीज भी नही कर रही है। जो शेष जमीन थी वहंा इस नहर बनने के कारण सिंचाई का पानी नही आता है। चूंकि सिंचाई की पुरानी छोटी नहरें पावर चैनल के कारण बंद हो गई है। इसलिये काफी जमीने बंजर हो गई है। पीने का पानी भी बांध कंपनी के द्वारा अनियमित तरह से मिलता है। बांध से नदी का पूरा पानी सुरंग में नदी में पानी बचा नही है।
ऽ    हमारी मांग है कि इस रिर्पोट पर तुरंत कार्यवाही की जाये ताकि इस पावर चैनल के नीचे रहने वाली आबादी का, जिसमें दलित परिवारों की संख्या ज्यादा है, जीवन सुरक्षित हो सके। 


विमलभाई,    महेश भारद्वाज,  
माटू जनसंगठन
रघुबीर कोहली {अम्बेडकर विकास संघर्ष समिति }



वाडिया सस्ंथान की 30-12-2015 की रिर्पोट का सार संलग्न है।


पॉवर चैनल {अलकनन्दा हाइड्रो पावर कॉर्पाेरेशन, श्रीनगर गढ़वाल, उत्तराखंड} के रिसाव पर भूवैज्ञानिक रिपोर्ट 30 दिसंबर, 2015 का संक्षेप 
माटू जनसंगठन द्वारा किये गये अनुवाद में कमी हो सकती है, चूंकि यह सशब्द अनुवाद नही है किन्तु मूल अर्थ रखने की कोशिश की गई है। 
 1. परिचय
निम्न रिपोर्ट श्री मंत्री प्रसाद नैथानी, शिक्षा मंत्री, उत्तराखंड सरकार द्वारा निदेशक, हिमालय भूविज्ञान के लिए वाडिया संस्थान {विग} देहरादून को दिए गए पत्र संख्या 554, 27 जून, 2015 के संदर्भ  पर आधारित है। इसमें मंत्री जी ने से विग अपेक्षा की थी कि कीर्तिनगर ब्लॉक, श्रीनगर गढ़वाल, उत्तराखंड के ग्राम सभा मंगसू क्षेत्र में पावर चैनल के अलकनन्दा हाइड्रो पावर कंपनी लिमिटेड से रिसाव समस्या का भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण किया जाए। इसी के संबंध में वैज्ञानिक डॉ. एस. एस. भाकुनी, निदेशक के निर्देश पर 21-23 सितम्बर 2015 को क्षेेत्र के दौरे पर आये। बाद में 31 अक्टूबर और 1 नवंबर, 2015 को श्री सी. बी. शर्मा, सहायक इंजीनियर ने डॉ. भाकुनी का क्षेत्र व रिसाव समस्या का अवलोकन करने के लिये दौरे में साथ दिया।  यात्रा के दौरान उन्होंने परियोजनाओं के संदर्भ में श्री संतोष रेड्डी, श्री एम. रमण रेड्डी, श्री रसूल, श्री मनप्रीत और अन्य अधिकारियों के साथ चर्चा की और साथ ही गांव वासियों से भी बातचीत की।
2. उद्देश्यः-
ऽ    पॉवर चैनल रिसाव की घटना।
ऽ    रिसाव के भूवैज्ञानिक पहलू पर नियंत्रण।
3. क्षेत्रः-
दौरा किया गया क्षेत्र प्रमुख श्रीनगर जोन (बाहरी शिवालिक हिमालय और भीतरी शिवालिक हिमालय के बीच एक विवर्तनिक सीमा) से 1200 मीटर दक्षिण पश्चिम में स्थित है। पावर चैनल रिसाव क्षेत्र दांये बैंक से पश्चिम दिशा की ओर चौड़ी नदी घाटी अलकनंदा, श्रीनगर गढ़वाल, उत्तराखंड से 200-300 मीटर दूर में स्थित है।
4. प्रश्नः
ऽ    छिद्रित पाइप पावर चैनल की खुदाई प्रक्रिया के दौरान पावर चैनल के नीचे क्यों डाले गए?
ऽ    रिसाव घटना में पुराने चैनल की क्या भूमिका रही और कैसे पावर चैनल का निर्माण पुराने चैनल के झुके हुये हिस्से पर हुआ?
5. वर्तमान निरीक्षण:
मंगसू ग्राम सभा अलकनन्दा नदी के दाहिने किनारे पर स्थित है। जो की निर्मित है 3.25 किमी लंबे नदी किनारे    (लगभग 650-200 मीटर चौड़ा और 40 मीटर मोटा) पर जो जमा हुआ है विस्तृत नदी अलकनन्दा की घाटी में जो बहती है छछॅ से ैैम् दिशा को और फिर मोड़ लेती है पूरब से पश्चिम दिशा को ग्राम सभा मंगसू और गुगली गांवों के सामने से। नदीतल सामग्री, नदी तल में होती है और इन पर ही पॉवर चैनल संरचना का गठन किया गया था।
5.1 भूवैज्ञानिक पहलू
श्रीनगर जोन या ैत् के उत्तर में चट्टाने  ुनंतज्रपजमे, उमजंइंेपबे, चूना पत्थर की बनी हैं जबकि दक्षिण में चट्टान मुख्य रूप से  ेसंजमे चीलससपजमे जो कि चांदपुर फार्मेशन के हैं, कि बनी हैं। टमतजपबंस विसपंजपवद चसंदम में भ्रंश पाए गए हैं जो की कुछ उउ से लेके 4बउ तक देखे गए हैं जो मिलते हैं अलकनन्दा नदी से सटे और साथ के क्षेत्रों में। अधिकांश क्षेत्र विभिन्न तरह के नदी किनारें और नदीतल सामग्री से ढका हुआ है। अलकनन्दा नदी के साथ ऊर्ध्वाधर पहलू और पावर चैनल के पास खड़ी पहलुओ से चट्टान उजागर हो रहे है। रेत और मिट्टी में लिपटी स्तरीकृत गोल पत्थर, कंकड़, ग्रैवल नदी किनारों में पाए जाते हैं। और पावर चैनल का निर्माण पैलियो-चैनल पर, जो निचले स्तर के नदी किनारांे पर हैं, किया गया है।

5.2 ज़मीन में दरारों का पाया जाना

मौजूद भूमि की सतह में घटाव के साथ जमीन में ताजी दरारें, पावर चैनल के निकट एक नाले में देखी गयी हैं जहां से पानी का रिसाव अलकनंदा नदी में मिलने वाले एक पैलियो-चैनल में मोड़ा गया है।
5.3 सक्रिय दोष और संबद्ध टूटे क्षेत्र का पाया जाना
100 मीटर विस्तृत क्षेत्र में, दक्षिण दिशा की ओर तीन मौडरेटेली डीपींगं दरारें की व्यवस्था, बहुत तेजी से नीचे फिसलती सीलिटे चीलससपजमे के भीतर पायी गई है जहां से पावर चैनल मोड़ा गया है और घुमावदार है। और इस पहचाने गये दरारों के साथ ही 0.2 से 0.6 मीटर चौड़े क्षेत्र में भी नुकसान हो गया है। इस नुकसान वाले क्षेत्र के साथ ही सीलिटे चट्टाने कुचली और चूर्णित की गई हैं और साथ ही खुले भ्रंश से कुछ टपकते पानी का रिसाव भी देखा गया है।
5.4 पॉवर चौनल रिसाव (3250 मीटर लंबे, 26 मीटर चौड़ी और 12-4 मीटर ऊंचाई)
पावर चैनल 10 से अधिक स्थानों पर टूटे हुआ पाया गया है जिसके परिणाम स्वरूप भारी मात्रा में पानी का रिसाव हुआ है। नई दरारें पावर चैनल के साथ विकसित हो रही हैं। पॉवर चैनल का 100 मीटर विस्तृत क्षेत्र भूमि की सतह के पास हो रहे रिसाव से प्रभावित है। इस क्षेत्र में तीन सक्रिय दरारें पहचानी गयी हैं। उपसतह दोष से रिसाव होते पानी की वजह से पॉवर चैनल के नीचे की ओर दवाब में वृद्धि होगी।
6. निष्कर्ष
1- पावर चैनल का निचला हिस्सा सक्रिय नदीतल दरारों से प्रभावित हुआ है। इसलिए ये संरचना तदनुसार मजबूत कि जानी चाहिए। और सक्रिय दोषों के पुनर्सक्रियन होने की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
2-पानी के रिसाव से बनने वाला पोर प्रेशर (जो फंसा हुआ है) से पावर चैनल के बाहरी ढांचे पर असर पड़ेगा जो आस पास के क्षेत्र में बाढ़ लाकर घरों और खेतों को डूबा सकता है, जो प्रभावित लोगों के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है।
3-दरार क्षेत्र में पावर चौनल का टूट हुआ होना एक गंभीर मुद्दा है जिस पर ठीक से विचार किया जाना चाहिए। स्पष्ट रूप में पावर चैनल का तटबंध अस्थिर है, जिसका पता पानी के रिसाव होने से चलता है।
7. सिफारिशें
ऽ    पावर चैनल के लगभग 200 मीटर विस्तृत क्षेत्र (प्रभावित रिसाव साइट) को वाडिया संस्थान देहरादून के संरचनात्मक भूवैज्ञानिकों के साथ परामर्श के द्वारा पुनः सुदृढ़ बनाया जाना चाहिए।
ऽ    इसके अलावा पावर चैनल के ढ़ाचे के डिजाइन की विस्तृत जांच करने की जरूरत है। जो निम्न तरह की संस्थाओं द्वारा किया जाये जैसे कि- सिंचाई डिजाइन संगठन, रुड़की। इस अभ्यास के दौरान वाडिया संस्थान देहरादून के संरचनात्मक भूवैज्ञानिकों के साथ परामर्श किया जाना चाहिए।

Tuesday, 18 April 2017

PN 19 April, 2017 आपके सपने पूरे करेंगे



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{स्वर्गीय श्री प्रेमवल्लभ काला जी  श्रीनगर 1970  बाढ़ का   स्तर दिखते हुए}

आपके सपने पूरे करेंगे

स्वर्गीय श्री प्रेमवल्लभ काला जी को उनके आकस्मिक निधन पर श्रद्धांजलि

एक शोक सभा में माटू जनसंगठन व श्रीनगर बाँध आपदा संघर्ष समिति के साथियों ने स्वर्गीय श्री प्रेमवल्लभ काला जी को उनके आकस्मिक निधन पर श्रद्धांजलि अर्पित की।

जीवन के सातवें दशक के करीब रहे श्री प्रेमवल्लभ काला जी श्रीनगर बाँध आपदा संघर्ष समिति के उपाध्यक्ष थे। उन्होने ही जून, 2013 को उत्तराखंड में आई की आपदा में, श्रीनगर के निचले क्षेत्र में आई पानी व मक की डूब के लिये श्रीनगर बांध कंपनी को जिम्मेदार माना और कानूनी कार्यवाही के लिये लोगो को प्रेरित किया। बाद में माटू जनसंगठन के साथ मिलकर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण में मुआवजे़ का केस दायर किया। समिति की ओर से वे केस में वादी बने। अपनी अस्वस्थता के बावजूद वे बराबर काम में लगे रहे।

ज्ञातव्य है कि 19 अगस्त 2016 को प्राधिकरण में हम केस जीते तो बांध कंपनी ने सर्वोच्च न्यायालय में इस आदेश को चुनौति दी है। केस चालू है। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के ही आदेश पर अभी मुआवजे के दावों के सत्यापन का कार्य उपजिलाधीश श्रीनगर के तत्वाधान में प्रगति पर है। जिसमें काला जी अंतिम समय तक सक्रिय रहे। 

शिक्षा विभाग में जीवन भर कार्यरत रहे श्री काला जी ईमानदारी व कमर्ठता की मूर्ति थे। अपने सेवानिवृत जीवन को भी उन्होने समाजकार्य में लगाया। वे अंतिम समय तक अपनी वृद्ध मांजी की सेवा भी करते रहे। उनका इस तरह जाना हमारे लिये अतुलनीय क्षति है। वे कहते थे कि हमारी लड़ाई मुआवजे की ही नही बल्कि न्याय की है। यह देश भर के बांध प्रभावितों के लिये एक नया रास्ता है। हम इस लड़ाई को मुकाम तक पहुंचायेगे। 

समिति ने काला जी को श्रद्धांजलि के साथ उनके स्थान पर समिति के कर्मठ कार्यकर्ता श्री हरिप्रसाद उप्रेती जी को उपाध्यक्ष व अदालत में समिति के प्रतिनिधी के रुप चुना है। 

साथी तेरे सपनो को मंजिल तक पहुंचायेगे।

चंद्र मोहन भट्ट,      विजयलक्ष्मी रतूड़ी,         सुरेन्द्र सिंह नेगी,         विमलभाई

Thursday, 13 April 2017

Press Note 13-4-2017

Press Note                                                                   13 , April, 2017

NGT put 50,00,000 Rs. Fine on THDC for environmental violation
World Bank funded Vishnugad-Peepalkoti HEP, River Alaknanda, Uttarakhand

Vimal Bhai v. THDC & Ors. (O.A 197 of 2016)

Project Name: Vishnugad-Peepalkoti HEP (444 MW)
Rivers: Alaknanda River
Agency: Tehri Hydro Development Corporation (THDC)
Environmental Clearance granted on 22-8-2007
Case in National Green Tribunal on the issue of environmental violation. {Dumping of the construction debris directly into the river}


The National Green Tribunal (Principal Bench) imposed Environmental Compensation of 50 Lacks on the Tehri Hydro Development Corporation Ltd ('THDC'). for disposal of debris and muck excavated out of construction of a road from the power house of the World Bank funded Vishnugad Peepalkoti Hydroelectric Project till the Alaknanda River. The judgment as delivered in open court on 13th April, 2017 in New Delhi by NGT Chaiperson Swatenter Kumar in the matter of Vimal Bhai v. Tehri Hydro Development Corporation Ltd. The petition in this matter was moved to the NGT by Environmental Activist Vimal Bhai, who was being represented by Advocate Rahul Choudhary of Legal Initiative for Forest and Environment.

The said construction led to huge amounts of muck and debris which were directly being dumped into the river, in violation of the law of the land including the Environment (Protection) Act, 1986 and the Environment Impact Assessment Notification, 2006 as well as the Environmental Clearance conditions granted to the THDC for construction and operation of the Hydroelectric Project. The said unchecked dumping increases the risk of landslides, destabilization of slopes and damage to the river flow, as was noted in the Environmental Assessment Report prepared for the THDC Hydroelectric Project.

Noting the gross negligence in disposing muck and debris accumulated due to the project as per a prescribed muck disposal plan and the lack of due monitoring of river flow upstream and down stream of the project, the NGT not only imposed compensation of 50 Lacks but mandated that 20 Lacks out of the said amount is to be paid by the subcontractors hired for the construction, being carried out since October, 2015. Additionally, the Tribunal imposed an absolute restriction on Muck Dumping in the Alaknanda River by the Project Proponent i.e THDC. More so, as a further deterrent, the NGT made it clear that in case the muck dumping continues, an additional cost of 25 Lacks would be imposed on the THDC. The Tribunal also directed the project proponent to maintain computerized records of water samples upstream and downstream as a precautionary measure, much needed in light of the unpredictable climatic conditions which affect the Alaknanda and other rivers in the State of Uttarakhand.

Today's judgement of National Green Tribunal on environmental degradation involved in Vishnugad-pepalkoti project is highly important and is a lesson for dam companies, World Bank, State governments and Central government.

In the course of  than a year long  legal battle, THDC kept repeating it's claim of following all the environment rules and displacement and rehabilitation laws. It kept claiming that it never discharged muck in the river. But the legal bench under the Honorable justice Swatantra Singh, based on the truth finding done in the valley, held THDC guilty of discharging muck in the river.
This judgment is one of its kind and the very first against any dam company in Uttarakhand. This judgement proves that Namami Ganga project, valued 20 thousand crores, had been incompetent in conserving and preserving the natural course and state of the main river and it's tributaries. This project has failed badly in it's aim of protecting Ganga and it's tributaries.

THDC kept claiming that it had never violated any environmental rules or rehabilitation laws in the Vishnugad-peepalkoti project.
Matu Jansanghatan from the start kept questioning these hollow claims of THDC.
This project is funded by World Bank and both World Bank and the dam company had been declaring that the best policies are in use in the said project.
Recently a film 'Blind Spot' https://www.youtube.com/watch?v=MHj4JbSmmsQ  was made with the help of Matu Jansanghatan which exposed the hollow claims of the dam company. Based on the direct interactions with the local people of the valley, this film's credibility was questioned by THDC.
Today the NGT order brought the truth out and gave us much needed support and motivation.
Now this fact is established that dam companies violate environmental laws and they are able to do it due to the patronage of the government.
If the central ministry would had been vigilant on the clearances given to the companies then the damage to the environment and the people of the valley could had been minimized.
But due to the negligence of the government, dam companies do not follow environmental rules and play with the laws. The outcome of this is visible in the form of environmental degradation and exploitation of the local people.
The intensity of the disaster of June 15-16, 2013  in Uttarakhand was increased due to the non compliance of environmental rules by the dam companies.
The same happened in Vishnuprayag and Srinagar project. In Vishnugad-peepalkoti project case it is proved that how the habit of ignoring environmental laws by the dam companies are critical to the environment and people residing in the area.
Water resources, river development and Ganga rejuvenation minister Ms. Uma Bharti also need to pay immediate attention to the aim of preserving and rejuvenating Ganga.
Dam companies are a big hindrance in Ganga rejuvenation.
Ganga cannot be rejuvenated by just repeating the words Namami Ganga.
Instead the rejuvenation work should also be concentrated on the place from where the Ganga originates.
The order of Nanital High court (20th March 2017) also gives direction to save and preserve the rivers and pointed out the bad state of the rivers and the need to work on their conservation.
We are thankful to NGT for this rational judgment.

We demand - that the state government, central government and World Bank, keeping this judgment in mind, should strengthen their vigilance bodies not just for Vishnugad-peepalkoti project but for all the hydro power project being run in the state of Uttarakhand and in the Himalayas, so that the natural flow of river is not disturbed and the river bed is preserved.

Vimalbhai,                                     Murli Singh Bhandari,                                           Ayaan Jamal

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने बांध कंपनी टी०एच०डी०सी०  

पर 50  लाख का जुरमाना ठोका

विष्णुगाड-पीपलकोटी बांध विश्व बैंक के कर्ज से अलकनंदा नदी पर, उत्तराखंड में निर्माणाधीन

प्रैस विज्ञप्ति                                                                                                                                                 13 अप्रैल 2017

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण NGT (प्रिंसिपल बेंच) ने टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कारपोरेशन पर  50 लाख का जुर्माना लगाया है। ये जुर्माना बांध कंपनी पर अलकनंदा नदी में कूड़ा और मक, जो कि विश्व बैंक के कर्ज से बन रहे विष्णुगाड-पीपलकोटी पावर प्लांट के पास बन रही एक रोड से निकला था, डालने पर  लगाया गया है। ये फैसला NGT कोर्ट ने माननीय जस्टिस स्वतंत्र सिंह की अद्यक्षता वाली बेंच में विमल भाई बनाम  केस में 13 अप्रैल 2017 को नई दिल्ली में सुनाया । ये केस राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण में पर्यावरण एक्टिविस्ट विमल भी द्वारा दाखिल किया गया था और विमल भाई का केस अधिवक्ता श्री ऋत्विक दत्ता और श्री राहुल चौधरी (लीगल इनिशिएटिव फ़ॉर फारेस्ट एंड एनवायरनमेंट) ने लड़ा।
राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण का विष्णुगाड -पीपलकोटी परियोजना के पर्यावरणीय उलंघनो पर आया आदेश बहुत ही महत्वपूर्ण और बांध कंपनियों  तथा विश्व बैंक, राज्य सरकार, केंद्र सरकार के लिए सबक है।

विमल भाई vs टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉर्पोरेश मुकदमे  में आज राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने अपने आदेश में बांध कंपनी पर 50 लाख का जुर्माना तथा PWD पर भी नोटिस जारी किया है।

साल भर से ज़्यादा चली कानूनी लड़ाई में THDC बार बार ये कहती रही की उसने कभी भी नदी में muck नही डाली। परंतु न्यायाधीश माननीय स्वतंत्र कुमार जी की अध्यक्षता में न्यायायिक पीठ ने वादी द्वारा प्रस्तुत किये गए सबूतों के आधार पर THDC को नदी में मक डालने का दोषी माना।
उत्तराखंड में किसीं भी बांध कंपनी के पर्यावरणीय उलंघनो पर इस तरह का ये पहला आदेश और जुर्माना है।
इस आदेश से साबित होता है कि 20 हज़ार करोड़ की नमामि गंगा परियोजना नदियों के संरक्षण के लिए व्यर्थ ही रही है। अब तक उत्तराखंड में गंगा की सहायक नदियों और मुख्य धाराओं के संरक्षण में नमामि गंगा परियोजना विफल रही है।

साल भर से ज्यादा चले इस केस में, THDC विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना में पर्यावरणीय उलंघनो और विस्थापन तथा पुनर्वास के मुद्दों पर NGT को लगातार यही बताता रहा कि वो इन मुद्दों पर बिल्कुल सही तरीके से काम कर रहा और कोई उलंघन नही किये गए।
माटू जनसंगठन ने शुरू से ही THDC  के इन दावों पर सवाल खड़े किए है।
विश्व बैंक के कर्जे से बन रही इस परियोजना में बांध कंपनी और वुश्व बैंक बराबर ये घोषणा करते रहे कि उनकी इस परियोजना में सबसे अच्छी नीतियों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
विमल भाई बनाम THDC केस में कंपनी के वकील लगातार विश्व बैंक और बांध कंपनी के इसी दावे को दोहराते रहे।
हाल ही में माटू जनसंगठन के सहयोग से बनी फिल्म Blind Spot ने बांध कंपनी के इन खोखले दावों की पोल खोल के रख दी थी।सीधे घाटी के लोगो के बयानों पर आधारित इस फ़िल्म पर भी THDC ने प्रशन खड़े किये थे।
आज NGT के इस आदेश से सच सामने आने के बाद हमे और मजबूती मिली है।
ये बात अब सिद्ध हो गयी है कि बांध कंपनियां पर्यावरणीय मानकों का उलंघन करती हैं और प्रसाशन की मिली भगत से ये ऐसा कर पा रही हैं।
यदि केंदीय मंत्रालय बांध कंपनियों को दी गई मंजूरी की निगरानी भली भांति करता तो लोगों को और पर्यावरण को इतना भारी नुकसान नही होता और न ही NGT में जाने की ज़रूरत पड़ती।
किन्तु केंद्र सरकार की लापरवाही से बांध कंपनियां मन माने तरीके से काम करती है और इसका नतीजा आज हम सब के सामने है।
ग्यातव्य है कि उत्तराखंड में जून 15-16, 2013 की आपदा में भी बांध कंपनियों के पर्यावरणीय उलंघनो के कारण आपदा में वृद्धि हुई थी।
विष्णुप्रयाग परियोजना में भी ऐसा ही हुआ। श्रीनगर परियोजना में भी ऐसा ही हुआ। और अब विष्णुगाड पीपलकोटी परियोजना में भी ये सिद्ध हुआ की बांध कंपनियों की मन मानी और नियमों को ताक पर रखने की आदत कितना नुकसान पहुंचा रही है।
जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय की मंत्री सु. श्री उमा भारती जी को भी इस आदेश के मद्देनज़र तुरंत गंगा संरक्षण पर सीध ही ध्यान देना होगा। गंगा संरक्षण में बांध कंपनियां बहुत बड़ी बाधा हैं।
मात्र नमामि गंगा के जाप से ही नदियां सुरक्षित नही होंगी अपितु,जहां से गंगा निकलती है वहां से ही गंगा के संरक्षण पर सीधे ध्यान देना ज़रूरी है।नैनीताल ऊच्च न्यायालय का ताज़ा आदेश (20 मार्च 2017) भी इसी ओर इंगित करता है कि नदियों की दशा किस हद तक खराब चल रही है और उन्हें संरक्षण की कितनी ज़रूरत है।

हम राष्टीय हरित प्राधिकरण के इस फैसले पर आभार व्यक्त करते है।---

हमारी राज्य सरकार, केंद्र सरकार और विश्व बैंक से ये मांग है कि वो इस आदेश के मद्देनज़र ना ही सिर्फ विष्णुगाड पीपल कोटि योजना अपितु उत्तराखंड और हिमालय में सभी जल विधुत परियोजना पर अपनी निगरानी तंत्र को मजबूत करे, ताकि नदियों को स्वतंत्र, अविरल और निर्मल बहने दिया जा सके।

विमल भाई  , मुरली सिंह भंडारी, अयान जमाल

Wednesday, 5 April 2017

प्रैस विज्ञप्ति 5, अप्रैल, 2017 गंगा यमुना क्या अब बंधने से बचेंगी?


प्रैस विज्ञप्ति                                                               5, अप्रैल, 2017

गंगा यमुना क्या अब बंधने से बचेंगी?

नैनीताल उच्च न्यायालय, उत्तराखंड ने 20 मार्च, 2017 को एक ऐतिहासिक आदेश दिया। न्यायालयों की चिंता केन्द्र व राज्य सरकारों की विफलता बताती है। अपने निर्णय में उच्च न्यायालय नैनीताल ने गंगा को एक मानव का दर्जा दिया है। मोहम्मद सलीम बनाम् उत्तराखंड सरकार व अन्य की याचिका नम्बर 2014 के 126 केस में न्यायाधीश श्री राजीव शर्मा व न्यायाधीश श्री आलोक सिंह ने अन्य मुद्दों के साथ में खास करके केंद्र सरकार को यह आदेश दिया की वो गंगा प्रबंधं बोर्ड बनाये। गंगा प्रबंधं बोर्ड धारा 80 के तहत जो भी समस्याएँ आती हैं उन्हें तुरंत दूर करे और तीन महीने के अन्दर में यह बोर्ड काम करने लगे।
अदालत ने अपने आदेश के दसवे बिंदु पर ये भी कहा की आज गंगा और यमुना एक असाधारण स्थिति का सामना कर रही है जहाँ वो अपने अस्तित्व को ही खो रही हैं। यह स्थिति असाधारण तरीके अपनाते हुए गंगा और यमुना नदी को जीवित रखते हुए बचाने की आवश्यकता बताती है।
उन्नीसवें बिन्दु में गंगा-यमुना को मानवीय दर्जा देते हुये कहा गया है किः-
अपनी ‘‘पेरेंट्स पेट्री‘‘ ताकत का इस्तेमाल करते हुए जिसका मतलब है की राज्य सरकार लोगों के अधिकारों और विशेष अधिकारों का ख्याल रखने के लिए ज़िम्मेदार है, गंगा और यमुना और उनकी सब सहायक नदियाँ, स्त्रोत, प्राकृतिक पानी का बहाव- तेजी से या रुक रुक कर, सबको क़ानूनी दर्जा दे दिया गया है और इनको मानव वाले अधिकार, कर्तव्य और उत्तरदायित्व होंगे जिससे की गंगा और यमुना नदियों को जीवित रखा जा सके। नमामि गंगा के निदेशक, मुख्य सचिव व राज्य के प्रघान वकील को गंगा और यमुना नदी और उनकी सहायक नदियों को जीवित और सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी दी गयी है।
अदालत ने इसी आदेश को आगे बढ़ाते हुये प्रदेश के ग्लेशियरों, झील-झरनों, घास के मैदानों, जंगलो आदि को भी जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया है।
माननीय उच्च न्यायालय का सम्मान करते हुये हम यह जोड़ते है कि गंगा यमुना को मात्र हिन्दु ही नही वरन् सभी धर्मो के अनुयायी मानते है। बादशाह अकबर भी गंगा जी का ही जल पीते थे। यह मात्र हिन्दुओं की ही नदी नही है जैसा की कुछ समूह यह सिद्ध करने की कोशिश कई सालो से कर रहे है। सभी नदियंा बिना धर्म, जाति, भाषा, लिंग आदि किसी का भी बिना भेदभाव किये सबको सब तरह से अपने लाभ देती है।
20 मार्च व बाद के आदेश में भी कहीं बांधों के बारे में अदालत ने साफ तौर पर कुछ नही कहा है। जोकि सरकार को बांधों के सवाल पर बच निकलने का रास्ता देता है। साथ ही नदी से जुड़ते हुये लोगो के अधिकारों के बारे में भी आदेश मौन है। यह हमारी चिंता का विषय है।
यह तो सिद्ध ही है कि बांधों से बहती नदी, ग्लेशियरों, झील-झरनों, घास के मैदानों व जंगलों आदि पर बुरा असर होता ही है। यदि किसी भी नदी को बांध दिया जाता है तो निचले हिस्से में पानी नही रहता जिससे नदी में बचा हुआ पानी भी गंदा हो जाता है। निर्मल नदी के लिये अविरल नदी का होना वास्तव में पहली शर्त है। अदालत के आदेश के बाद अब सरकार पर ये जिम्मेदारी साफ तौर पर आ गई है।
गंगा के संदर्भ में अदालतों के पुराने आदेशों की पालना को देखते हुये इस आदेश की पालना पर संदेह होता है। 2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया। गंगा पर हजारों करोड़ रुपये गंगा एक्शन प्लान के तहत खर्च हुये थे। जिसकी आलोचना करते हुये भाजपा सरकार ने 20 हजार करोड़ से ‘‘नमामि गंगा‘‘ की शुरुआत की। 22 फरवरी को राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने कहा की ‘नमामि गंगा‘‘ के तहत खर्च किये गये 2 हजार करोड़ से कुछ नही हुआ है। टिहरी बांध की पर्यावरण स्वीकृति में भागीरथी नदी घाटी प्राधिकरण बनाने की शर्त थी। जो अभी तक भी ढंग से काम नही कर पाया है। ‘नमामि गंगा‘‘ में भी गंगाघाटी के बांधों की समस्याओं पर कोई बात नही है। दुखद पहलू है कि वर्तमान आदेश में भी कही बांधों का जिक्र नही है।
कांग्रेस व भाजपा दोनो ही दल जब से उत्तराखंड राज्य बना है, राज्य में अपनी सरकारें बना चुके है। केन्द्र में भी कांग्रेस शासन के बाद लगभग 3 वर्षो से भाजपा सरकार है। गंगा के मायके में गंगा की स्थिति पर दोनो ही बांधों के खतरनाक खेल में शामिल है। फिर इन सरकारों से हम क्या उम्मीद रखे की वो गंगा-यमुना के अभिवावक का कर्तव्य निभायेगे?
इस आदेश का देश के तमाम नदी प्रेमियों ने स्वागत किया है। खतरा है कि इस आदेश का अुनपालन करने कि जिम्मेदारी जिनको दी गई है वो उसी सरकार के नीचे काम कर रहे है। जिसके व्यवहार के बारे हमने अपनी चिंताये बराबर रखी है। राज्य के मुख्यमंत्री जी ने इस आदेश के आते ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय में उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौति देने की बात कही है। माननीय मुख्य मंत्री जी ने पद संभालते ही यमुना के बांधों में तेजी लाने के लिये केन्द्र से बात की है। ये नयी सरकार के भावी क्रियाकलापों की ओर इशारा करता है।
हम दोनो सरकारों को इन प्रश्नों के जवाब की अपेक्षा करते हैः--

  • सरकारें भागीरथी को 100 किलोमीटर पर ‘‘इकोसेंसेटिव जोन‘‘ बनाये जाने पर अपना रुख साफ करेगी?
  • सरकारो द्वारा बांधो पर किस सीमा तक रोक लगाई जायेगी?
  • माननीय सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे केस जिसमें न्यायालय ने 24 बांधों पर रोक लगाई है, उस पर सरकारों का क्या रुख रहेगा?
  • ‘‘नमामि गंगा कार्यक्रम‘‘ के पदाधिकारियों को अदालत ने जिम्मेदार बनाया है तो क्या नमामि गंगा कार्यक्रम में अब गंगा के बांधों की बात होगी?
  • बांध कंपनियांे के अब तक के पर्यावरणीय उलंघनों पर कोई कार्यवाही होगी?

विमलभाई,    राजपाल रावत

Tuesday, 21 March 2017

PN- 21 March, 2017

प्रैस विज्ञप्ति                     
                                                                                                                                   21 मार्च 2017

उत्तराखण्ड की नई सरकार का स्वागत व अपेक्षायें

मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र रावत जी के नेतृत्व में बनी नई सरकार का हम तहे दिल से स्वागत करते हैं। अपेक्षा करते है कि वे राज्य की जनता के सभी वर्गो के हकों का सम्मान करते हुये पर्यावरण का भी ध्यान रखेंगे। खासकर नदियों संरक्षण के साथ किनारे रहने वालो के सुरक्षित भविष्य को सुनिश्चित करेंगे।

उत्तराखण्ड का पर्यावरण और बड़ी परियोजनाओं व अन्य कारणों से हुये विस्थापितों के पुनर्वास का बहुत बड़ा मुद्दा है। उत्तराखंड की लगभग 66 प्रतिशत ज़मीन पर जंगल है। खेती की ज़मीन पहाड़ी क्षेत्रों में तो बहुत ही कम लगभग 7 प्रतिशत है। जहंा पर भी बड़ी परियोजनायें आ रही है। तराई क्षेत्र में जहाँ आबादी ज्यादा है वहां उद्योग आये है। हमने चुनाव के समय में भी इस मुद्दे को उठाया था की क्यों पर्यावरण के मुद्दे और लोगों के जीवन व उत्तराखण्ड के स्थायी विकास से जुड़े मुद्दे इस चुनाव में राजनैतिक दलों के मुद्दे नही बने।

चुनावों के समय आरोप-प्रत्यारोप बहुत होते हैं। एक दूसरे राजनीतिक दल विभिन्न मुद्दों पर बहुत तरह से, नीति से लेकर व्यक्तिगत रुप से भी उम्मीदवारों की खन्दोल करते है। इन सबसे बहुत सारी चीज़ें भी निकल करके भी आती हैं। इन चुनावों में भी विभिन्न सवालों से लेकर भ्रष्टाचार तक के व्यक्तिगत आक्षेप उठाये गए। आज जब नई सरकार हमारे सामने है तो वो उन सब आरोप-प्रत्यारोप की दलदल से निकलकर नई तरह से राज्य के लोगो और दीर्घकालीन पर्यावरण हित में काम करेगा। ये हमारी अपेक्षा है।

नई सरकार से कुछ तुंरत कदमों की अपेक्षा है। चूंकि केन्द्र, उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश राज्य में आपके दल की ही सरकारें है। इसलिये बहुत से कार्य जो केन्द्र व राज्य की खीचातानी में नही हो पा रहे थे वे अब सुगमता से होने चाहिये।

भ्रष्टाचार पर तुरंत पाबंदी होः
इस छोटे से राज्य की जड़ो को भ्रष्टाचार ने खोखला कर दिया है। नई सरकार भ्रष्टाचार को समाप्त करने का नारा देकर आई है। इसलिये सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिये कि वो भ्रष्टाचार को हर स्तर पर चाहे वो शासन स्तर पर हो या प्रशासन हो उसको सख्ती से रोकना चाहिये। भ्रष्टाचार के रुकने से राज्य के विकास कार्याे का स्तर उंचा उठेगा। कमीशन प्रथा समाप्त होनी चाहिये। वर्तमान सरकार ने पिछली सरकार को इस सवाल पर बहुत घेरा है और स्वच्छ प्रशासन देने का वादा किया है। इसलिये भ्रष्टाचार रोकना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिये। ये हमारी अपेक्षा है।

टिहरी बांध से विस्थापितों के समुचित व न्यायपूर्ण पुनर्वासः

नई सरकार के सामने बहुत बड़ी चुनौति है कि टिहरी बांध से विस्थापितों के समुचित व न्यायपूर्ण पुनर्वास की। जो अभी तक नही हो पाया है। बांध कंपनी टीएचडीसीएल बहुत ज़ोर दे रही है की उसे बांध पूरा भरने की इजाज़त दी जाये मगर अभी तक ये इजाज़त नही दी गयी है क्योंकि पुनर्वास-पुर्नस्थापना का काम पूरा नही हुआ है। झील के किनारे के लगभग 40 गांव जो धसक रहे है उनके लिये अभी एक सम्पार्श्विक नीति बनी थी उसपर भी अमल नही हो पाया है। इस पर तुरंत अमल हो। ये हमारी अपेक्षा है।

जून 2013 की आपदा को बढ़ाने बांध कंपनियों की भूमिका पर बांध कंपनियों पर कार्यवाही होः
जून 2013 की आपदा में बांधो के कारण तबाही में वृद्धि हुई थी। इसे सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर बनी रवि चोपड़ा कमेटी ने भी माना है और विभिन्न स्वतंत्र विशेषज्ञो ने भी कहा है। श्रीनगर स्थित गढ़वाल विश्विद्यालय के प्रोफेसर सती जी और प्रोफ़ेसर सुंदरियाल जी ने बहुत स्पष्ट रूप से यह कहा है किन्तु बंाध कंपनियों पर कोई कार्यवाही नही हो पायी है। नयी सरकार उस पर कार्यवाही करेगी ताकि बांध कंपनियंों द्वारा हो रही तबाही की खुली छूट पर लगाम लगे। ये हमारी अपेक्षा है।

बांध प्रभावितों को मुफ्त बिजली का लाभ मिलेः
बांधों से राज्य को 12 व 1 प्रतिशत मिलने वाली मुफ्त बिजली जो कि केन्द्रिय उर्जा मंत्रालय की नीति के तहत बांध प्रभावितों पर व प्रभावित क्षेत्र के विकास के लिये ही खर्च होनी चाहिये थी। किन्तु आज तक ऐसा नही हुआ है। अकेले टिहरी बांध से ही लगभग दो हजार करोड़ राज्य सरकार को अब तक मिल चुके है। नई सरकार तुरंत इस पर कदम उठाये ताकि जिन बांधो के लिये उत्तराखंड निवासियों ने अपना सर्वस्व दिया है उनके साथ न्याय हो सके। ये हमारी अपेक्षा है।

राज्य का विकास व पर्यावरण रक्षाः
हमे जंगलों को, यहाँ के पानी को यहाँ के लोगों के लिए इस्तेमाल करते हुए आगे बढ़ना होगा। आज भी उत्तराखंड का पानी नीचे ही जाता जा रहा है उसका मुख्य कारण यही है की हमने स्थायी और विकेन्द्रित योजनाओं को उत्तराखण्ड में विकसित नही किया। हमने बाहरी उद्योगों को सब्सिडी देकर के बुलाया। जब सब्सिडी खत्म हो गयी जो उद्योग बाहर जाने की बात करेंगे। ये उद्योग चंद छोटी नौकरी से ज्यादा राज्य को प्रदूषण दे रहे है। इसका आकलन होना चाहिये कि इन उद्योगो से राज्य को क्या मिला। ये हमारी अपेक्षा है।

राज्य सरकार का दायित्व है की वो राज्य के पर्यावरण की भी रक्षा करे क्योंकि राज्य का पर्यावरण राज्य के निरंतर व स्थायी विकास के लिए एक ज़रूरत है। उत्तराखण्ड का विकास मैदानी विकास की तरह नही हो सकता। यह राज्य मध्य हिमालय में स्थित एक पहाड़ी राज्य है, यहाँ जंगल भरपूर है, जड़ी बूटी भरपूर है, जल भरपूर है, पर्यटन की अकूत संभावनायें है, तीर्थो की भूमि है। किन्तु यह एक दुर्भाग्य ही रहा है की उत्तराखण्ड का विकास शहरी विकास और मैदानी विकास की तरह ही देखा जाता है। जबकि उत्तराखंड का विकास उत्तराखंड को पहाड़ की दृष्टि से ही किया जाना स्थायी होगा। ये हमारी अपेक्षा है।

वन अधिकार कानून 2006ः
हमने यहाँ के मूलभूत संसांधनो को आगे बढ़ाने व संरक्षित रखने का काम नही किया। हमने यहाँ के जंगलों को लोगों को देने का काम नही किया। जिस जंगल को चिपको आंदोलन गौरादेवी जैसी ग्रामीण महिलाओं ने बचाया, सुंदरलाल बहुगुणा जी ने अंतराष्ट्रीय स्तर पर यह सवाल उठाया। उसी वन को माफिया के हाथ में दे दिया गया है। वन संरक्षण सही तरह से हो। वनो पर लोगो को ‘‘वन अधिकार कानून 2006‘‘ के तहत कानूनी अधिकार दिये जाये। ये हमारी अपेक्षा है।

गंगा रक्षण व नैनीताल उच्च न्यायालय का 20 मार्च, 2017 का आदेशः


जिन नदियों को खासकर गंगाजी को बचाने के लिए राज्य व देशभर के लोग चिंतारत हो आगे बढे़। पिछले कुछ सालो में सरकार ने भी कुछ नियम कायदे कानून बनाए है। इन नदियों में कानूनी व गैरकानूनी खनन हो रहा है। जो गंगा सहित सभी नदियों के लिये नुकसानदायक है। नई सरकार इस खनन को रोके और नदियों के       दीर्घकालीन स्वास्थ्य को बचाये।
बांधो से नदियों का प्रवाह समाप्त हो रहा है। जब नदियों में पानी ही नही तो नदियंा अपने आप ही गंदी होंगी। गंदगी उपचार यंत्र लगाने का क्या फायदा होगा? फिर ये यंत्र भविष्य में बांध में ना डूबे यह निश्चित करना होगा। नमामिः गंगा योजना में उत्तराखंड को अलग तरह से देखना होगा। गंगा के अविरल प्रवाह को सुनिश्चित करना उस पर कड़ी निगरानी रखना उसके लिये आवश्यक तंत्र विकसित करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिये। नैनीताल उच्च न्यायालय का 20 मार्च, 2017 का आदेश इसमें एक महत्वपूर्ण कड़ी जुड़ी है। चूंकि केन्द्र, उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश राज्य में आपके दल की ही सरकारें है। इसलिये न्यायालय के आदेशानुसार ‘‘गंगा प्रबंध बोर्ड‘‘ के गठन में कोई रुकावट नही आनी चाहिये।
ये हमारी अपेक्षा है।

चारधाम यात्रा व मार्ग व रेल मार्गः

चारधाम यात्रा को सालभर चलाया जाये ताकि देश भर के लोग तीर्थों के दर्शन कर सके व राज्य की आमदनी में भी व्द्धि हो। चारधाम यात्रा मार्ग व रेल मार्ग दोनो ही परियोजनायें बहुत से पर्यावरणीय व विस्थापन के सवालो को उठायेंगी। दोनो ही परियोजनाओं के इन सवालों को आप जनहक व पर्यावरणीय संतुलन की दृष्टि से हल करें। ये हमारी अपेक्षा है।

शराब बंदी लागू होः
उत्तराखंड की महिलाओं ने लंबे आंदोलन के बाद वर्षाे पहले शराब बंदी लागू करवाई थी जिसे श्री कल्याण सिंह जी ने 90 के दशक में जब वो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हटा दिया। नई सरकार से यह भी अपेक्षा होगी कि आज जब राज्य में जगह-जगह महिलायें आगे आकर फिर से शराब के खिलाफ मोर्चा खोल रही है और देश भर में तो शराब बंदी का माहौल हो ही रहा है। बिहार में शराब बन्दी पूर्ण तरह लागू है व गुजरात में तो पहले से ही लागू है। देश भर में ‘‘जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समंवय‘‘ के साथ ‘‘नशा मुक्त भारत अभियान‘‘ चल रहा है। ऐसे में नई सरकार उत्तराखंड में शराब बंदी लागू करके उत्तराखंड के गौरव को वापस लाये। युवाओं को शराब से बचाकर उन्हे स्वस्थ्य समाज के लिये प्रोत्साहित करे। शराब बंदी होने से युवाओं के अंदर में सोच समझ की शक्ति बढ़ेगी और वे राज्य के विकास मे सकारात्मक योगदान दे पाएंगे। सरकार पूर्ण नशाबंदी करे जिसमें शराब के साथ अन्य नशों पर भी पाबंदी लगे। इसके लिये बनने वाले कानून लोगो को नशे से दूर करने के लिये प्रोत्साहित करने वाले हो ना कि मात्र भय पैदा करने वाले हो। ये हमारी अपेक्षा है।

हमने इन सारे संदर्भों को माननीय मुख्यमंत्री जी को भेजे स्वागत पत्र में उठाया है। हमारी अपेक्षा है कि नई सरकार इन अपेक्षाओं को स्वीकार करेगी और राज्य को नई ऊंचाईयों पर ले जायेगी।

विमलभाई,       पूरण सिंह राणा,     गोपाल सक्सेना,       मीना आगरी,       हरीश रतूड़ी

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Uttarakhand New Government: Greetings & Expectations 

We welcome the new government of Uttarakhand formed under the leadership of Shri. Trivendra Singh Rawat and hope that the government will not only work for the betterment of all sections of the society but shall also pay attention to the environmental concerns in the state. In particular we hope that steps will be taken for river conservation and to preserve the future of people living on the banks of the rivers.
Environmental concerns and rehabilitation of the displaced people are major issues for the state but political parties continue to ignore the same. While only 7% of the land in the hill regions is suitable for agriculture, industries have intruded even in the terai regions of the state.
While there is a slugfest of allegations and counter allegations during elections, we expect that now the new government is in office, it shall work for the long term benefit of the environment. In particular following are the major steps we expect the government to take urgently:

Curbing corruption:
Corruption has eaten into this small state like a moth. This new government has come to power with the promise of eradicating this corruption and therefore the government should strive towards reducing corruption at all levels. Curbing corruption shall also help in raising the standards of development work in the state. The system of commission must come to an end. The new government campaigned aggressively against last government on this ground and hence curbing corruption should be its first priority.

Proper and adequate rehabilitation of people displaced by Tehri dam:
One of the biggest challenges before the new government is to ensure just and proper rehabilitation of people displaced by Tehri dam which has not happened till now. The company making the dam THDCL is pushing for the permission to fill the dam to the fullest. However, this permission has not been granted because the process of resettlement and rehabilitation has not been completed yet. A new policy was enacted for close to 40 villages which are impacted, but the same has not been implemented. We hope that this policy will be acted upon.

Initiate actions against the companies for their role in the disaster of 2013:
The impact of the disaster of 2013 was multiplied because of the dams. This has been confirmed by the committee constituted pursuant to the orders of the Hon’ble Supreme Court as also by several independent experts.  Professor Sati Ji and Professor Sundariyal of Gadhwal University have also corroborated the same but no action has been taken against the companies running or managing the dams. We expect that this new government will act against such companies so that destruction caused by such dams can be arrested.

People affected by dams should get free electricity:
12% and 1 % of the free electricity which as per the policies of the Central Power Ministry should have been used for the dam affected areas has never been done.  State government has received approximately INR 2000 crore from Tehri dam Project alone. We expect that the new government takes immediate steps to ensure that justice is done to people who have given everything for these dams.

Development and protection of environment:
We have to use our jungles and water in a sustainable manner. Water tables in the state is still in decline and the primary reason for the same is non-development of permanent and decentralized schemes. We invited industries from outside on subsidy who will leave the state as soon as subsidy is withdrawn and these industries are polluting the state in exchange for some petty jobs. Benefits of such industries must be evaluated.
It is the responsibility of the state government that the environment of the state is conserved because that is essential for its continued development. Development of Uttarakhand cannot be achieved in the manner of any other state in the plains. The state is situated in the middle Himalayas and is blessed with herbs, water and tremendous potential for tourism as it is a land of pilgrimage. However, it is unfortunate that the development of the state has also been seen and carried out on the lines of any city or state in the plains when its necessary to see the state as hill state and plan accordingly for its development.

Forest Rights Act, 2006:
We have not taken care of basic resources of this place and refused to allow people to manage their jungles. Jungles which were at the centre of Chipko movement and were protected by the likes of Gaura Devi and Sundar Lal Bahuguna who raised their voices at the international level have been handed over to mafias. We expect that steps for forest conservation are taken and people are given rights to the forest under Forest Rights Act, 2006.

Saving Ganga and order of Nainital High Court dated 20th March:
People should come forward to protect           various rivers including Ganga. In the last few years governments have enacted various laws. However, legal and illegal mining continues unabated in these rivers which is harmful to many rivers including Ganga. We hope that government takes steps to stop such mining to protect the long-term health of these rivers. Dams are restricting the flow of water in the rivers which will lead to rivers getting dirty. Benefits of cleaning devices needs to be evaluated and it needs to be ensured that does not drown in the rivers. Uttarakhand needs to be seen differently under the Namami Ganga project and ensuring uninterrupted flow of Ganga by developing appropriate devices and instruments should be the priority of this government.

Order of Nainital High Court dated 20th March , 2017 will play  an important in this regards. Now when in center, in Uttarakhand and in Uttar Pradesh your party is in the power so we hope there will not be any difficulty to form the “Ganga Mangement Board” as per the direction of the High Court.

Chardham Pilgrimage and Railways network:
Chardam Yata must continue whole year so that state government as well as people of the state will be benefited more. The new Chardham pilgrimage and railway network raises many environmental and displacement concerns and both the projects should be resolved keeping in mind the best interest of general public and environment.

Prohibition should be enforced:
Women of the state after a long struggle had ensured that the government bans liquor which was uplifted by Mr. Kalyan Singh in the nineties. It will now be expected from the government that in the face of resurgence of women struggle against liquor and backdrop of general mood of prohibition illustrated by recent ban in Bihar, the government bans liquor in Uttarakhand. State level movements have combined to struggle for intoxicant free India and in this background government can reclaim the glory of Uttarakhand by banning liquor and encouraging youth to move towards a healthy society. This will also increase the general awareness and intelligence of the youth who will then contribute to the development of the country. Also government should ban all forms of intoxicants. The law in this regard should not be harsh and instill fear but should seek to encourage people to stay away from intoxicants.

We have raised all the above mentioned matters in the letter to the Chief Minister and expect that the government will act on it and take the state to new heights.

Vimalbhai ,       Puran Singh Rana,               Gopal Sexena,        Meena Aagri,      Harish Raturi