Tuesday, 21 March 2017

PN- 21 March, 2017

प्रैस विज्ञप्ति                     
                                                                                                                                   21 मार्च 2017

उत्तराखण्ड की नई सरकार का स्वागत व अपेक्षायें

मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र रावत जी के नेतृत्व में बनी नई सरकार का हम तहे दिल से स्वागत करते हैं। अपेक्षा करते है कि वे राज्य की जनता के सभी वर्गो के हकों का सम्मान करते हुये पर्यावरण का भी ध्यान रखेंगे। खासकर नदियों संरक्षण के साथ किनारे रहने वालो के सुरक्षित भविष्य को सुनिश्चित करेंगे।

उत्तराखण्ड का पर्यावरण और बड़ी परियोजनाओं व अन्य कारणों से हुये विस्थापितों के पुनर्वास का बहुत बड़ा मुद्दा है। उत्तराखंड की लगभग 66 प्रतिशत ज़मीन पर जंगल है। खेती की ज़मीन पहाड़ी क्षेत्रों में तो बहुत ही कम लगभग 7 प्रतिशत है। जहंा पर भी बड़ी परियोजनायें आ रही है। तराई क्षेत्र में जहाँ आबादी ज्यादा है वहां उद्योग आये है। हमने चुनाव के समय में भी इस मुद्दे को उठाया था की क्यों पर्यावरण के मुद्दे और लोगों के जीवन व उत्तराखण्ड के स्थायी विकास से जुड़े मुद्दे इस चुनाव में राजनैतिक दलों के मुद्दे नही बने।

चुनावों के समय आरोप-प्रत्यारोप बहुत होते हैं। एक दूसरे राजनीतिक दल विभिन्न मुद्दों पर बहुत तरह से, नीति से लेकर व्यक्तिगत रुप से भी उम्मीदवारों की खन्दोल करते है। इन सबसे बहुत सारी चीज़ें भी निकल करके भी आती हैं। इन चुनावों में भी विभिन्न सवालों से लेकर भ्रष्टाचार तक के व्यक्तिगत आक्षेप उठाये गए। आज जब नई सरकार हमारे सामने है तो वो उन सब आरोप-प्रत्यारोप की दलदल से निकलकर नई तरह से राज्य के लोगो और दीर्घकालीन पर्यावरण हित में काम करेगा। ये हमारी अपेक्षा है।

नई सरकार से कुछ तुंरत कदमों की अपेक्षा है। चूंकि केन्द्र, उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश राज्य में आपके दल की ही सरकारें है। इसलिये बहुत से कार्य जो केन्द्र व राज्य की खीचातानी में नही हो पा रहे थे वे अब सुगमता से होने चाहिये।

भ्रष्टाचार पर तुरंत पाबंदी होः
इस छोटे से राज्य की जड़ो को भ्रष्टाचार ने खोखला कर दिया है। नई सरकार भ्रष्टाचार को समाप्त करने का नारा देकर आई है। इसलिये सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिये कि वो भ्रष्टाचार को हर स्तर पर चाहे वो शासन स्तर पर हो या प्रशासन हो उसको सख्ती से रोकना चाहिये। भ्रष्टाचार के रुकने से राज्य के विकास कार्याे का स्तर उंचा उठेगा। कमीशन प्रथा समाप्त होनी चाहिये। वर्तमान सरकार ने पिछली सरकार को इस सवाल पर बहुत घेरा है और स्वच्छ प्रशासन देने का वादा किया है। इसलिये भ्रष्टाचार रोकना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिये। ये हमारी अपेक्षा है।

टिहरी बांध से विस्थापितों के समुचित व न्यायपूर्ण पुनर्वासः

नई सरकार के सामने बहुत बड़ी चुनौति है कि टिहरी बांध से विस्थापितों के समुचित व न्यायपूर्ण पुनर्वास की। जो अभी तक नही हो पाया है। बांध कंपनी टीएचडीसीएल बहुत ज़ोर दे रही है की उसे बांध पूरा भरने की इजाज़त दी जाये मगर अभी तक ये इजाज़त नही दी गयी है क्योंकि पुनर्वास-पुर्नस्थापना का काम पूरा नही हुआ है। झील के किनारे के लगभग 40 गांव जो धसक रहे है उनके लिये अभी एक सम्पार्श्विक नीति बनी थी उसपर भी अमल नही हो पाया है। इस पर तुरंत अमल हो। ये हमारी अपेक्षा है।

जून 2013 की आपदा को बढ़ाने बांध कंपनियों की भूमिका पर बांध कंपनियों पर कार्यवाही होः
जून 2013 की आपदा में बांधो के कारण तबाही में वृद्धि हुई थी। इसे सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर बनी रवि चोपड़ा कमेटी ने भी माना है और विभिन्न स्वतंत्र विशेषज्ञो ने भी कहा है। श्रीनगर स्थित गढ़वाल विश्विद्यालय के प्रोफेसर सती जी और प्रोफ़ेसर सुंदरियाल जी ने बहुत स्पष्ट रूप से यह कहा है किन्तु बंाध कंपनियों पर कोई कार्यवाही नही हो पायी है। नयी सरकार उस पर कार्यवाही करेगी ताकि बांध कंपनियंों द्वारा हो रही तबाही की खुली छूट पर लगाम लगे। ये हमारी अपेक्षा है।

बांध प्रभावितों को मुफ्त बिजली का लाभ मिलेः
बांधों से राज्य को 12 व 1 प्रतिशत मिलने वाली मुफ्त बिजली जो कि केन्द्रिय उर्जा मंत्रालय की नीति के तहत बांध प्रभावितों पर व प्रभावित क्षेत्र के विकास के लिये ही खर्च होनी चाहिये थी। किन्तु आज तक ऐसा नही हुआ है। अकेले टिहरी बांध से ही लगभग दो हजार करोड़ राज्य सरकार को अब तक मिल चुके है। नई सरकार तुरंत इस पर कदम उठाये ताकि जिन बांधो के लिये उत्तराखंड निवासियों ने अपना सर्वस्व दिया है उनके साथ न्याय हो सके। ये हमारी अपेक्षा है।

राज्य का विकास व पर्यावरण रक्षाः
हमे जंगलों को, यहाँ के पानी को यहाँ के लोगों के लिए इस्तेमाल करते हुए आगे बढ़ना होगा। आज भी उत्तराखंड का पानी नीचे ही जाता जा रहा है उसका मुख्य कारण यही है की हमने स्थायी और विकेन्द्रित योजनाओं को उत्तराखण्ड में विकसित नही किया। हमने बाहरी उद्योगों को सब्सिडी देकर के बुलाया। जब सब्सिडी खत्म हो गयी जो उद्योग बाहर जाने की बात करेंगे। ये उद्योग चंद छोटी नौकरी से ज्यादा राज्य को प्रदूषण दे रहे है। इसका आकलन होना चाहिये कि इन उद्योगो से राज्य को क्या मिला। ये हमारी अपेक्षा है।

राज्य सरकार का दायित्व है की वो राज्य के पर्यावरण की भी रक्षा करे क्योंकि राज्य का पर्यावरण राज्य के निरंतर व स्थायी विकास के लिए एक ज़रूरत है। उत्तराखण्ड का विकास मैदानी विकास की तरह नही हो सकता। यह राज्य मध्य हिमालय में स्थित एक पहाड़ी राज्य है, यहाँ जंगल भरपूर है, जड़ी बूटी भरपूर है, जल भरपूर है, पर्यटन की अकूत संभावनायें है, तीर्थो की भूमि है। किन्तु यह एक दुर्भाग्य ही रहा है की उत्तराखण्ड का विकास शहरी विकास और मैदानी विकास की तरह ही देखा जाता है। जबकि उत्तराखंड का विकास उत्तराखंड को पहाड़ की दृष्टि से ही किया जाना स्थायी होगा। ये हमारी अपेक्षा है।

वन अधिकार कानून 2006ः
हमने यहाँ के मूलभूत संसांधनो को आगे बढ़ाने व संरक्षित रखने का काम नही किया। हमने यहाँ के जंगलों को लोगों को देने का काम नही किया। जिस जंगल को चिपको आंदोलन गौरादेवी जैसी ग्रामीण महिलाओं ने बचाया, सुंदरलाल बहुगुणा जी ने अंतराष्ट्रीय स्तर पर यह सवाल उठाया। उसी वन को माफिया के हाथ में दे दिया गया है। वन संरक्षण सही तरह से हो। वनो पर लोगो को ‘‘वन अधिकार कानून 2006‘‘ के तहत कानूनी अधिकार दिये जाये। ये हमारी अपेक्षा है।

गंगा रक्षण व नैनीताल उच्च न्यायालय का 20 मार्च, 2017 का आदेशः


जिन नदियों को खासकर गंगाजी को बचाने के लिए राज्य व देशभर के लोग चिंतारत हो आगे बढे़। पिछले कुछ सालो में सरकार ने भी कुछ नियम कायदे कानून बनाए है। इन नदियों में कानूनी व गैरकानूनी खनन हो रहा है। जो गंगा सहित सभी नदियों के लिये नुकसानदायक है। नई सरकार इस खनन को रोके और नदियों के       दीर्घकालीन स्वास्थ्य को बचाये।
बांधो से नदियों का प्रवाह समाप्त हो रहा है। जब नदियों में पानी ही नही तो नदियंा अपने आप ही गंदी होंगी। गंदगी उपचार यंत्र लगाने का क्या फायदा होगा? फिर ये यंत्र भविष्य में बांध में ना डूबे यह निश्चित करना होगा। नमामिः गंगा योजना में उत्तराखंड को अलग तरह से देखना होगा। गंगा के अविरल प्रवाह को सुनिश्चित करना उस पर कड़ी निगरानी रखना उसके लिये आवश्यक तंत्र विकसित करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिये। नैनीताल उच्च न्यायालय का 20 मार्च, 2017 का आदेश इसमें एक महत्वपूर्ण कड़ी जुड़ी है। चूंकि केन्द्र, उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश राज्य में आपके दल की ही सरकारें है। इसलिये न्यायालय के आदेशानुसार ‘‘गंगा प्रबंध बोर्ड‘‘ के गठन में कोई रुकावट नही आनी चाहिये।
ये हमारी अपेक्षा है।

चारधाम यात्रा व मार्ग व रेल मार्गः

चारधाम यात्रा को सालभर चलाया जाये ताकि देश भर के लोग तीर्थों के दर्शन कर सके व राज्य की आमदनी में भी व्द्धि हो। चारधाम यात्रा मार्ग व रेल मार्ग दोनो ही परियोजनायें बहुत से पर्यावरणीय व विस्थापन के सवालो को उठायेंगी। दोनो ही परियोजनाओं के इन सवालों को आप जनहक व पर्यावरणीय संतुलन की दृष्टि से हल करें। ये हमारी अपेक्षा है।

शराब बंदी लागू होः
उत्तराखंड की महिलाओं ने लंबे आंदोलन के बाद वर्षाे पहले शराब बंदी लागू करवाई थी जिसे श्री कल्याण सिंह जी ने 90 के दशक में जब वो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हटा दिया। नई सरकार से यह भी अपेक्षा होगी कि आज जब राज्य में जगह-जगह महिलायें आगे आकर फिर से शराब के खिलाफ मोर्चा खोल रही है और देश भर में तो शराब बंदी का माहौल हो ही रहा है। बिहार में शराब बन्दी पूर्ण तरह लागू है व गुजरात में तो पहले से ही लागू है। देश भर में ‘‘जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समंवय‘‘ के साथ ‘‘नशा मुक्त भारत अभियान‘‘ चल रहा है। ऐसे में नई सरकार उत्तराखंड में शराब बंदी लागू करके उत्तराखंड के गौरव को वापस लाये। युवाओं को शराब से बचाकर उन्हे स्वस्थ्य समाज के लिये प्रोत्साहित करे। शराब बंदी होने से युवाओं के अंदर में सोच समझ की शक्ति बढ़ेगी और वे राज्य के विकास मे सकारात्मक योगदान दे पाएंगे। सरकार पूर्ण नशाबंदी करे जिसमें शराब के साथ अन्य नशों पर भी पाबंदी लगे। इसके लिये बनने वाले कानून लोगो को नशे से दूर करने के लिये प्रोत्साहित करने वाले हो ना कि मात्र भय पैदा करने वाले हो। ये हमारी अपेक्षा है।

हमने इन सारे संदर्भों को माननीय मुख्यमंत्री जी को भेजे स्वागत पत्र में उठाया है। हमारी अपेक्षा है कि नई सरकार इन अपेक्षाओं को स्वीकार करेगी और राज्य को नई ऊंचाईयों पर ले जायेगी।

विमलभाई,       पूरण सिंह राणा,     गोपाल सक्सेना,       मीना आगरी,       हरीश रतूड़ी

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Uttarakhand New Government: Greetings & Expectations 

We welcome the new government of Uttarakhand formed under the leadership of Shri. Trivendra Singh Rawat and hope that the government will not only work for the betterment of all sections of the society but shall also pay attention to the environmental concerns in the state. In particular we hope that steps will be taken for river conservation and to preserve the future of people living on the banks of the rivers.
Environmental concerns and rehabilitation of the displaced people are major issues for the state but political parties continue to ignore the same. While only 7% of the land in the hill regions is suitable for agriculture, industries have intruded even in the terai regions of the state.
While there is a slugfest of allegations and counter allegations during elections, we expect that now the new government is in office, it shall work for the long term benefit of the environment. In particular following are the major steps we expect the government to take urgently:

Curbing corruption:
Corruption has eaten into this small state like a moth. This new government has come to power with the promise of eradicating this corruption and therefore the government should strive towards reducing corruption at all levels. Curbing corruption shall also help in raising the standards of development work in the state. The system of commission must come to an end. The new government campaigned aggressively against last government on this ground and hence curbing corruption should be its first priority.

Proper and adequate rehabilitation of people displaced by Tehri dam:
One of the biggest challenges before the new government is to ensure just and proper rehabilitation of people displaced by Tehri dam which has not happened till now. The company making the dam THDCL is pushing for the permission to fill the dam to the fullest. However, this permission has not been granted because the process of resettlement and rehabilitation has not been completed yet. A new policy was enacted for close to 40 villages which are impacted, but the same has not been implemented. We hope that this policy will be acted upon.

Initiate actions against the companies for their role in the disaster of 2013:
The impact of the disaster of 2013 was multiplied because of the dams. This has been confirmed by the committee constituted pursuant to the orders of the Hon’ble Supreme Court as also by several independent experts.  Professor Sati Ji and Professor Sundariyal of Gadhwal University have also corroborated the same but no action has been taken against the companies running or managing the dams. We expect that this new government will act against such companies so that destruction caused by such dams can be arrested.

People affected by dams should get free electricity:
12% and 1 % of the free electricity which as per the policies of the Central Power Ministry should have been used for the dam affected areas has never been done.  State government has received approximately INR 2000 crore from Tehri dam Project alone. We expect that the new government takes immediate steps to ensure that justice is done to people who have given everything for these dams.

Development and protection of environment:
We have to use our jungles and water in a sustainable manner. Water tables in the state is still in decline and the primary reason for the same is non-development of permanent and decentralized schemes. We invited industries from outside on subsidy who will leave the state as soon as subsidy is withdrawn and these industries are polluting the state in exchange for some petty jobs. Benefits of such industries must be evaluated.
It is the responsibility of the state government that the environment of the state is conserved because that is essential for its continued development. Development of Uttarakhand cannot be achieved in the manner of any other state in the plains. The state is situated in the middle Himalayas and is blessed with herbs, water and tremendous potential for tourism as it is a land of pilgrimage. However, it is unfortunate that the development of the state has also been seen and carried out on the lines of any city or state in the plains when its necessary to see the state as hill state and plan accordingly for its development.

Forest Rights Act, 2006:
We have not taken care of basic resources of this place and refused to allow people to manage their jungles. Jungles which were at the centre of Chipko movement and were protected by the likes of Gaura Devi and Sundar Lal Bahuguna who raised their voices at the international level have been handed over to mafias. We expect that steps for forest conservation are taken and people are given rights to the forest under Forest Rights Act, 2006.

Saving Ganga and order of Nainital High Court dated 20th March:
People should come forward to protect           various rivers including Ganga. In the last few years governments have enacted various laws. However, legal and illegal mining continues unabated in these rivers which is harmful to many rivers including Ganga. We hope that government takes steps to stop such mining to protect the long-term health of these rivers. Dams are restricting the flow of water in the rivers which will lead to rivers getting dirty. Benefits of cleaning devices needs to be evaluated and it needs to be ensured that does not drown in the rivers. Uttarakhand needs to be seen differently under the Namami Ganga project and ensuring uninterrupted flow of Ganga by developing appropriate devices and instruments should be the priority of this government.

Order of Nainital High Court dated 20th March , 2017 will play  an important in this regards. Now when in center, in Uttarakhand and in Uttar Pradesh your party is in the power so we hope there will not be any difficulty to form the “Ganga Mangement Board” as per the direction of the High Court.

Chardham Pilgrimage and Railways network:
Chardam Yata must continue whole year so that state government as well as people of the state will be benefited more. The new Chardham pilgrimage and railway network raises many environmental and displacement concerns and both the projects should be resolved keeping in mind the best interest of general public and environment.

Prohibition should be enforced:
Women of the state after a long struggle had ensured that the government bans liquor which was uplifted by Mr. Kalyan Singh in the nineties. It will now be expected from the government that in the face of resurgence of women struggle against liquor and backdrop of general mood of prohibition illustrated by recent ban in Bihar, the government bans liquor in Uttarakhand. State level movements have combined to struggle for intoxicant free India and in this background government can reclaim the glory of Uttarakhand by banning liquor and encouraging youth to move towards a healthy society. This will also increase the general awareness and intelligence of the youth who will then contribute to the development of the country. Also government should ban all forms of intoxicants. The law in this regard should not be harsh and instill fear but should seek to encourage people to stay away from intoxicants.

We have raised all the above mentioned matters in the letter to the Chief Minister and expect that the government will act on it and take the state to new heights.

Vimalbhai ,       Puran Singh Rana,               Gopal Sexena,        Meena Aagri,      Harish Raturi

Sunday, 26 February 2017

PN-26-2-2017


Matu Jansangathan and Srinagar
Bandh Aapda Sangharsh Samiti
प्रैस विज्ञप्ति 
 
श्रीनगर बांध की समस्याओं के लिये केन्द्रिय पर्यावरण मंत्रालय जिम्मेदार
''श्रीनगर बांध पर राष्ट्रीय जनआयोग‘‘ की घोषणा 
 
श्रीनगर बांध परियोजना के पर्यावरण व पुर्नवास तथा अन्य सवालों की निगरानी रखने और निर्णय लेने की पूर्ण जिम्मेदारी केन्द्रिय पर्यावरण मंत्रालय की है। हाल ही में जल संसाधन एवं नदी विकास और गंगा पुनर्जीवन मंत्री सुश्री उमा भारती जी ने उत्तराखंड राज्य सरकार को परियोजना के विभिन्न नियमों के उल्लंधनों पर कार्यवाही करने का जो निर्देश दिया है उसका श्रीनगर के नागरिकों ने स्वागत किया है।

श्रीनगर बाँध आपदा संघर्ष समिति व माटू जनसंगठन के तत्वाधान में उत्तराखंड में अलकनंदा नदी के किनारें श्रीनगर में आयोजित सेमिनार में वक्ताओं ने परियोजना बनने से पहले और परियोजना के चालू होने के बाद विभिन्न असरों पर अपनी बात रखी । माटू संगठन के समन्वयक विमल भाई ने कहा कि हम मंत्री जी के पत्र में व्यक्त की गई चिन्ताओं का स्वागत करते हैं। हम मानते हैं कि राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह अपने स्तर पर परियोजना से संबंधित मुद्दों का तथ्य परक आंकलन करें और अपनी रिपोर्ट केन्द्रिय मंत्रालय को भेजें और साथ ही उन्होने यह भी स्पष्ट किया कि परियोजना की मूलतः दो पर्यावरण और वन स्वीकृतियां, केन्द्रिय पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्रालय द्वारा दी जाती हैं। इसलिये मंत्रालय की यह पहली जिम्मेदारी है कि वह दोनों स्वीकृतियों पर निगरानी करे। इस मंत्रालय ने बिना किसी अध्ययन, पर्यावरण प्रभाव आंकलन किये बांध की उंचाई 65 मी0 से 95 मी0 तथा विद्युत उत्पादन क्षमता 220 मेगावाट से 330 मेगावाट करने की अनुमति दी जिसका नतीजा यह हुआ कि मां धारी देवी का प्राचीनतम मंदिर जलमग्न हो गया, श्रीनगर शहर को लगातार समस्याओं का सामना करना पड़ा है जिसमें पीने का गंदा पानी, बांध की नहर के रिसाव के कारण चौरास क्षेत्र के अनुसूचित जाति बहुल मंगसू, सुरासू, गुगली नागराजासैण, पतुल्डु तथा नौर व मढ़ी आदि समस्त वह क्षेत्र जहां से परियोजना की नहर गुजरती है, खतरे की स्थिति में है। जिसे सरकारी वाडिया संस्थान ने भी स्वीकारा है। अलकनंदा लोगो से छिन गई है।

गढ़वाल के केन्द्रिय विश्वविद्यालय, श्रीनगर के भूगर्भ विज्ञानी प्रो0 सती ने कहा कि यह परियोजना भूगर्भीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में बना दी गई है जो कि भविष्य के लिये खतरा है।
कीर्तिनगर से चन्द्रभानु तिवाड़ी ने कहा कि बांध का मक निस्तारण के बारे में पर्यावरण मंत्रालय ने पूर्व में अपनी स्वीकृति में स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं दिये थे और बांध कम्पनी ने भी मक का निस्तारण समुचित तरीके से नहीं किया जिस कारण सन् 2013 की आपदा में श्रीनगर शहर के एक हिस्से को भयंकर परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। एन0 जी0 टी0 के 19/08/2016 के आदेश में यह बात स्वीकार की गई है।
मंगसू गांव के महेश भारद्वाज का कहना है कि हमें छला गया। पहले हम नदी से पानी लाते थे अब पीने का पानी दो दिन में एक बार मिलता है। बांध नहर के कारण सिंचाई की गूलें खत्म हो गई, हमारी जमीनों पर खेती नहीं हो पा रही और जो जमीनें लीज पर ली थीं कम्पनी नें उसका हर साल एक समझौता करना था । जो कई सालों से नहीं हुआ है। हमारे रिहायशी भवनों में भी दरारें है न पशुओं को चारा है न घर में अनाज। रोजगार से भी युवाओं को भी बंचित कर दिया गया है।
भक्तियाना क्षेत्र की वार्ड सदस्य सुश्री विजयलक्ष्मी रतूड़ी ने कहा कि बांध से मिलने वाला 12 प्रतिशत व 1 प्रतिशत बिजली का पैसा जो क्षेत्र के लिये खर्च किया जाना था उसका कुछ पता ही नहीं है।
श्रीनगर बांध आपदा संधर्ष समिति के अध्यक्ष जी श्री चन्द्र मोहन भट्ट ने चिन्ता व्यक्त की कि नदी में अविरल प्रवाह न होने के कारण बांध से पावर हाउस तक नदी का पारिस्थितिकि तन्त्र खत्म हो गया है। मछलियों का जीवनचक्र प्रभावित हुइा है। 6 सरकारी ट्यूबवैल निर्मित होने से पहले ही बेकार हो गये।
  • अन्य विभिन्न वक्ताओं ने भी बांध से उत्पन्न विभिन्न समस्याओं पर चिन्ता व्यक्त की। सेमिनार के अंत में सर्वसम्मति से केन्द्रिय मंत्री सुश्री उमा भारती जी, श्री अनिल माधव दवे व मुख्य मंत्री श्री हरीश रावत जी को पत्र के माध्यम से अपनी चिन्ताओं से अवगत करवाया व मांग की कि ये सभी मुद्दे केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा अध्ययन किये जायें। पर्यावरण मंत्रालय अपनी जिम्मेदारी निभाये चूंकि पर्यावरण एवं वन दोनों की ही स्वीकृति उसने ही दी है।
  • आगे की रणनीति के तौर पर बांध से जुड़ी सभी समस्याओं पर एक विस्तृत अध्ययन रिपोर्ट के लिये एक ‘‘श्रीनगर बांध पर राष्ट्रीय जनआयोग‘‘ की घोषणा की गई जिसके नामों घोषणा भी जल्दी की जायेगी। यह जनआयोंग अगले दो महीनों में इस रिर्पोट को सरकार को भेजेेगा तथा राज्य सरकार द्वारा की जा रही कार्यवाही पर निगाह भी रखेगा।
हरीश रतूड़ी ,  इंदु उप्रेती,  सुरेंदर सिंह नेगी

Tuesday, 14 February 2017

14- 2-2017

Releasing  BANDH KATHA 27 (Tunneling the Himalayas)

We, Matu Jansangathan is releasing a 3 minutes video named BANDH KATHA 27 (Tunneling the Himalayas) on the impacts of Run of the River project. This movie can be seen to understood how Run of the River Projects have misunderstood by people and how they are impacting environment and life of people.
Please spread the word.


https://www.youtube.com/watch?v=6eBg9jzjZLo

Safina Khan

Thursday, 9 February 2017

Press Note 9-2-2017 पर्यावरण एवं विस्थापन राजनैतिक पार्टियों के मुद्दो से गायब है!

English version after the Hindi Press Note
पै्रस विज्ञप्ति                                                                     9 फरवरी, 2017

पर्यावरण एवं विस्थापन राजनैतिक पार्टियों के  मुद्दो से गायब है!

उत्तराखंड के लोग अपना पांचवा राज्य विधानसभा चुनने जा रहे है। हमने पाया कि बांध व अन्य बड़ी परियोजनायें, खदान, शराब, बेरोजगारी, पर्यटन, इत्यादि के कारण हो रहा विस्थापन का वास्तविक मुद्दे है। ये सब राजनैतिक पार्टियों के एजेंडा में शामिल नहीं है। जून 2013 की त्रासदी से प्रभावित लोग अभी भी ठीक तरीके से ना बसाये गये है ना ही सभी को क्षतिपूर्ति मिली है। इन सब  मुद्दों के अलावा, वे उन मुद्दों को उठा रहे है जो की अस्तित्व में ही नहीं है और न ही उत्तराखंड के लोगों एवं हरे-भरे वातावरण संबघी रोजाना की समस्याओं को हल कर सकेंगें। 
उत्तराखंड एक हरा-भरा, नदियों खासतौर से राष्ट्रीय नदी गंगा और पांचधाम (बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, और हेमकुंड साहिब) वाला हिमालयी राज्य है। कोई भी राजनैतिक पार्टी, यहाँ के स्रोतों से बड़े लोगों को छोड़कर, स्थानीय लोगो का भला करने वाले, विकास के रोडमैप के साथ नहीं उतरी है। 
यह स्थान जहाँ से राष्ट्रीय नदी गंगा निकलती है, इस नष्ट एवं गायब हो रही गंगा के संरक्षण का कोई एजेंडा  उन राजनैतिक पार्टियों के पास भी नही है जो “नमामि गंगा” का राष्ट्रीय स्तर पर मंत्रोच्चारण करते रहते है।
हमारे पास जीवंत उदहारण है जहाँ समस्याएं बिना समाधान के जारी है। जैसे की टिहरी बाँध, जो इसके जलाशय के आसपास रहने वाले लोगों के लिए कभी न ख़त्म होने समस्या बन गया है। 40 से ज्यादा गंाव, घरों में दरार, भूमि धंसान, इत्यादि की समस्या का सामना कर रहे हैं। इन समस्याओं के कारण रोज के रोज एक नये गांव को पुनर्वास की जरुरत है। सभी पुल जो भागीरथी नदी के दोनों किनारों को जोड़ेंगे अभी तक पुरे नहीं हुए है। अभी तक सभी विस्थापितों को उनके पुनर्वास स्थल पर जमीन अधिकार एवं नागरिक सुविधाएँ नहीं मिली है। पिछले सभी चुनावों में ये मुद्दा स्थानीय स्तर पर उठाया जाता रहा है लेकिन चुनाव जीतने के बाद सरकारी योजनाओ में नही दिखाई देता है। यद्दपि बड़ी पार्टियाँ केंद्र एवं राज्य स्तर पर काबिज थी, किन्तु उन्होने नीति स्तर पर कुछ नहीं किया। 
परियोजना दर परियोजना विस्थापन बढ़ रहा है और जमीन की उपलब्धता कम होती जा रही है। औद्योगिक क्षेत्र, रुद्रपुर, देहरादून, हरिद्वार एवं हल्दानी में विकसित किये जा रहे है। लेकिन 70 प्रतिशत स्थानीय लोगों को रोजगार देने की नीति अभी भी अमल में नहीं लायी गयी है। स्थानीय लोगों को दिए गए रोजगार का स्तर बहुत ही कम है। पुरे राज्य में लोग हमेशा, परियोजना वालों एवं अलग-अलग कंपनियों से रोजगार के लिए लड़ते है। जिनमे से बाँध के द्वारा प्रभावित हुए लोगों की हालत दयनीय है। अधिकतर घटनाओं में देखा गया है की लोग जब भी अपना हक पाने लिये आवाजें उठाते है तो उन्हें झूठे मुकदमो में फंसा दिया जाता है और कभी-कभी जेलों में डाल दिया जाता है। 
पर्यावरण संरक्षण नियमों का पालन न होने के कारण, पर्यावरण को भी क्षति पहुँच रही है जैसे की औद्योगिक क्षेत्र अपने क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन कर रही है। बाँध कम्पनियाँ गन्दगी और मलबे को सीधे ही नदियों में डाल रही है। अवैध रेत खनन, नदी को बुरी तरह से प्रभावित कर रही है। चेक और बैलेंस की स्थिति बहुत ही बुरी है और जब भी जन संगठन इन मुद्दों को उठाते है तो सरकार की तरफ से शायद ही कोई ध्यान दिया जाता है। यह राज्य की विडम्बना ही है कि पर्यावरण मुकदमों में सरकार हमेशा परियोजना वालों और कंपनियों का ही पक्ष लेती है।
बड़ी राजनैतिक पार्टियाँ अपने नैतिक मूल्यों को खो चुकी है। राजनेता जो एक पार्टी को कई सालों से समर्थन देते आये है और दूसरी पार्टी का भ्रष्टाचार और अन्य मुद्दों पर आलोचना करते आये है, अचानक से उसी पार्टी में चले जाते है। वे अचानक से नैतिक एवं सही कैसे हो सकते है? यह स्पष्ट बताता है की सत्ता हासिल करना उनका मुख्य लक्ष्य है, बजाय उत्तराखंड के लोगों की सेवा करना।
इन स्थितियों में सही प्रत्याशी को वोट करने का चुनाव करना बहुत ही कठिन हो जाता है। हम उत्तराखंड के लोगो से यह निवेदन करते है की उन्हें निम्न आधारों पर प्रत्याशियों को वोट करना चाहिए.....
प्रत्याशी ईमानदार होना चाहिए और उस पर कोई भी भ्रष्टाचार का आरोप नहीं होना चाहिए।
प्रत्याशी का ध्यान राज्य के विविध पेड़-पौधे, जंगल-जानवर, और नदी के संरक्षण तथा विस्थापन की समस्या एवं पूर्ण पुनर्वास पर भी होना चाहिए।
प्रत्याशी को यह समझ हो की राज्य की प्राकृतिक संसाधनों का लोगों की भलाई में उपयोग हो नाकि बड़ी कंपनियों का लाभ बढ़ाने में हो।
प्रत्याशी के पुराना इतिहास को भी नजरिये में रखना होगा। 


विमल भाई       सुदर्शन साह
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PRESS NOTE

Environment and displacement issues are not political parties issues

People of Uttarakhand are going to elect their 5th State Assembly. We found the real issue of displacement of people due to HEPs, big infrastructure; mining, liquor, unemployment, people based tourism etc. which are not on the agenda of political parties. People affected by 2013 disaster not yet properly compensated and recovered from their losses. Instead of these, they are pampering issues which don’t exist and do not solve day to day problems of Uttarkhandi’s  life and green environment of the state. 

Uttarakhand state of Himalaya, green cover, rivers specially National River Ganga and Paanchdham (Badrinath, Kedarnath, Gangotri, Yamunotri and Hemkundshaheb). No big political party had came out with making a roadmap for the development of people through its resources benefitted to the people not to the big players. It’s also where National River Ganga originate but protection of dying and disappearing Ganga and its tributaries is not on the agenda of political party chanting Namami Ganga at national level.

We have living examples where problems are continue without solution. Like Tehri Dam has become a never ending problem for the people living around the reservoir. More than 40 Villages are facing problem of cracks in houses, sinking etc. Day by day new villages need rehabilitation due to these problems. All the Bridges which connect both side of Bhagirathi river not yet completed. Even till now all the oustees didn’t get Land rights and basic civic amenities at their rehabilitation sites. In every elections these issues addressed at very local level but nothing comes out after winning elections in policies of Government. Although big political parties were in power at both centre and state level, in spite of this they haven’t done anything at policy level.

New displacement in the state is increasing, project by project and slowly availability of land is reducing. Industrial areas are developed in Rudrapur, Dehradun, Haridwar and Haldwani. But Policy of seventy percent employment to local people not yet implemented. The level of employment given to locals is very low. In whole State people always fighting with the Project Proponents and different companies for employment. The condition of Dam effected people is bad. In most of the cases when they raise voice for their rights are facing false cases and sometimes put in jails.

The environmental condition is also depleting as these industrial areas are producing more carbon in their areas, not following prescribe environmental protection rules. Dam companies are throwing muck and debris directly into the river. Illegal mining destroying river beds. Check and balance situation is very minimal and when people’s Organisation bring these issues in front of Government it hardly pays any attention. It’s irony of State which always takes side of Project Proponents and Companies in environmental cases.

Big political parties have lost their ethical values, political leaders who have served in one party for years have switched to parties which once criticized them for corruption charges, now suddenly after changing their party how they became morally correct. This shows that acquiring Power is their main aim, not serving Uttrakhand’s people.

In this situation it’s very difficult to vote a appropriate candidate. We appeal to the masses that they must cast their votes on the basis of...

·        Candidate must be honest and he shouldn’t have corruption or any other charges.
·        Candidate should also focus upon issue, displacement environment conservation as river protection and flora fauna of State.
·        Candidate must recognise that natural wealth of state should be gently use for the benefit of the locals not for the big companies.
·        Candidate's past record must be consider.

Vimalbhai    Sudershan Sah
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Friday, 13 January 2017

Press Note 13-1-2017: बांध सुरंगों के अंत अंधेरे ही हैं -Film "Blind Spot " Released



Press  Note.                                    13-7-2017

बांध सुरंगों के अंत अंधेरे ही हैं

अलकनंदा पर विष्णुगाड – पीपलकोटि की सुरंगों के प्रभाव पर बनी फिल्म “BLIND SPOT” रिलीज़

हमें तो मजाक का पात्र बना दिया है, घर के नीचे सुरंग बन रही है, नुकसान कितना होगा? पता नहीं । पुराने नुकसान की भरपाई नहीं हुई। आन्दोलन किया तो कोर्ट कचहरी झेलो। कोर्ट ने भी पाबन्दी लगा दी है कि  लोग बांध काम के पास भी नहीं जा सकते । अब क्या करें? ये कहना है रामलाल जी का। वे दुर्गापुर निवासी हैं । दुर्गापुर, वो वाला ग्राम पंचायत का हिस्सा है जहाँ दलित परिवार रहते हैं । गाँव के नीचे से THDC बांध कंपनी ”विष्णुगाड-पीपलकोटि जल – विद्युत् परियोजना के लिए बन रहे पॉवर हाउस की सुरंगें बना रही हैं । विस्फोटों से मकानों पर दरारें आई हैं, भविष्य की गारंटी नहीं।

हाट गाँव के हरसारी तोक की भी यही स्थिति रही। परियोजना प्रभावित अन्य गावों में से सुरंग के ऊपर वाले गांवों में यही खतरा है । क्या गारंटी कि परियोजना बनने के बाद भी सब सुरक्षित रहेगा? विष्णुप्रयाग बांध की सुरंग के ऊपर चाई- थाई गांवों में वर्षों बाद बर्बादी आई। नेपी कंपनी ने नुकसान से इनकार किया ।

विश्व बैंक द्वारा पोषित इस परियोजना में भी सुरंग के असरों का आकलन नहीं किया जा रहा है। पुर्नवास से कम खर्चा करने का ये तरीका है । आन्दोलन करने पर जेल की धमकी । क्या गंगा, बांध विस्थापित गाँव भारत में नहीं हैं, ये प्रश्न राजेंद्र हटवाले के हैं । 

नरेन्द्र पोखरियाल वर्षों से अपने गाँव की रक्षा व गंगा की अविरलता के लिए संघर्ष करते रहे मगर, भ्रम और वादे ही मिले । समस्याओं का सही समाधान ना देना, इसमें विश्व बैंक केंद्र व राज्य सरकारें शामिल हैं । “ मीडिया कलेक्टिव” द्वारा बनायीं गयी मिनट्स की फिल्म “ ब्लैक स्पॉट” में यही सब समेटने की कोशिश की गयी है । हिंदी में बनी अंग्रेजी शब्दांकन के साथ श्री हेगन देसा ने इसे बनाया है । 

यह फिल्म विष्णुगाड – पीपलकोटि की समस्याओं के माध्यम से सुरंग परियोजनाओं की हकीकत सामने लाती है । जब पूरी गंगा – यमुना – काली- सरयू व उसकी सभी सहायक नदियों को सुरंगों में बांधने की तैयारी है तो यह फिल्म योजनाकारों, सरकारों व कर्जा देने वाले विश्वबैंक जैसे साहूकारों के सामने असलियत रख रही है ,अपेक्षा है वे इससे कुछ सीख पाएंगे ।
आज चमोली जिले के मुख्यालय गोपेश्वर में ग्रामीणों ने फिल्म रिलीज़ की ।          
                 
रीना देवी, विमल भाई
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Darkness is the only end of Dam Tunnels

“Blind Spot” - A film made on the impacts of Vishugaad – Peepalkoti tunnels on Alaknanda River released
“We have been ignored and treated merely as a character to laugh at. The tunnel is being built beneath our houses. How much damage will it do, nobody knows. The compensation of previous damages have not been made yet. If we will protest then we will have to face the court cases. The Court has made restrictions on people’s visiting the Dams working sites. Now what to do?”, says Ramlal, a residence of Durgapur Village. Durgapur village is the part of Village Panchayat where dalit families reside. The THDC, Dam Construction Company, is building/ constructing tunnels for Vishnugaad – Peepalkoti Hydro Power Project Power House. Cracks have appeared on the walls of houses present above the tunnels due to high intensity blasts happened during the construction of tunnels, the future has become uncertain. 

The condition of the Harsari hamlet of Haat Village is also the same. The other project affected villages are also facing the same threat and uncertainties. What is the guarantee that everything will be secure once the projects will be completed? The tunnel of Vishnuprayag dam have already brought disaster in Chai –Thai Village after years where NEPI Company had denied claims of any losses. 

There has been no evaluation done of the impacts from these tunnel in World Bank fostered projects. This is the way of neglecting the much required expenditure on rehabilitation and other issues. We get the threats of arrest if we resist and protest for our rights. Are the Ganga dam affected region not in India?, questioned Rajendra Hatwal.
Narendra Pokhariyal have been struggling since years for security of his Village and constant flow of the River Ganga but got only false promises and increased confusion. World Bank and State government is responsible for not giving the right solutions of the issues. The film “Black Spot” made by Media Collective tried to cover all these aspects. This Hindi film with subtitles in English is made by Hagen Desa.

This film reveals the reality of tunnel projects through the issues prevailing in Vishnugaad - Peepalkoti Dam affected area. When there is planning to bind Ganga – Yamuna – Kali - Saryu and all their tributaries in tunnels, then this film reveals the grim realities and likely impacts in front of development planners, government agencies and financial institutions like World bank, we expect that they will learn a lot from this and bring subsequent changes in their attitude taking people’s and environmental issues on higher priorities.

This film has been released by the villagers in Gopeshwar headquarter of Chamoli district. 

Reena Devi,        Vimal Bhai

Sunday, 11 December 2016

PN-MOEFCC is not serious about the National River Ganga


 MOEFCC committee asking people about their issues
 Sudersahn Sah & Rajendra Negi with others  talking to the MOEFCC committee

 Rajendra Negi ji speaking to committee
 
 
 
 
 
 
 
MOEFCC is not serious about the National River Ganga
Matu Jansangathan and Local People of Devpryag Condemn the Non-Serious Committee Assessment and argued for free Ganga
On 10th December, a committee consisting of 5 members reached Devpryag without prior information to the local People. Whereas the local people were unaware about the arrival of the committee, local contractors were present there. People were waiting at Devpryag, where Bhagirathi and Alaknanda meets and made National River Ganga. The Committee members asked people their grievances about the Dams. Rajendra Negi and Sudershan Sah of Matu Jansangthan strongly kept their points like why big dams should not be built and  the impact of already constructed dams. A representation addressed to the secretary of MOEF&CC was given by them to the said committee. A group of Srinagar people also argued against big dams on Ganga. Although the group of local contractors, who were well informed by the Dam companies fought with all the people who were putting their objections.
Matu petition narrated why big dam projects should not come up on the National River Ganga. They also gave three books describes about religious places in and around Devpryag and about the disaster made by the Dams. “One Sarsard ji form the committee asked them to bring the people who have signed the petition, and refused to take the books provided by Matu Jan Sangathan members and the local people saying “We will not take these books, can keep them personally”.
People raised objections, doubts and suggestions in the petition, as summaries here: -
Only through a Hindi newspaper on 9th December people came to know that a committee from MOEF&CC coming to  Devpryag. Other than this, no information to the local people, no information about committee’s subject and work area, no information about the time period the committee will assess the projects, no information about to whom this committee is going to meet, work area of the committee, awareness about the assessment field of the committee………………….Devprayag Known to be the origin place of the National River Ganga where Alaknanda Ganga and Bhagirathi Ganga confluence. The religious and cultural belief of Ganga ji cannot assesed by this kind of confusion. ………………….Uttarakhand is maternal home of Ganga ji and Ganga ji neglected Dam projects during the 2013 calamity. Due to Dams over on the tributaries of The Ganga the disaster level in 2013 disaster have been  increased.
1. Because of Srinagar dam, residence of Bhaktiyana area have seen the flood all over.
2. Because of the broken Vishnuprayag Dam downstream 7 villages had to face heavy calamity. It causes damage of two bridges on River Alaknanda, one for the Badrinathji and second for the Hemkund Sahib.
3. Because of the emerging dams in Mandakini valley, Mahamaheshwar River and Kali River, the whole Valley is facing problem of landslides due to which the local people have to suffer.
4. The same situation arises in Bhagirathi valley. The surrounding areas of the Bhagirathi valley faces huge destruction.
The condition of all the tributary River of Ganga makes bad impact on Devprayag. Here the question is not of our religious beliefs only but of our future securities also.

In recent years many people have been flown with the unannounced  water released from the Tehri dam, the record of these people is also not available. In 2016 one Sadhu Gopal Maniji was organized Gau- Ganga katha at Triveni Ghat in Rishikesh. The sudden release of the Dam water left them almost dead, somehow the local administration saved their life.
We are living in an insecure region. There are frequent landslides adjacent to Kotli Bhel 1A, even NHPC’s office was also damaged. Kotli Bhel Projects around Devprayag will destroy/ruin the morality of the Existence, Security and culture and belief of Devpryag.
It seems that MOEF&CC is not taking the dam impacts on National River Ganga seriously which is very much clear through this Non-Serious Committee Assessment efforts. This is to be reminded that Kotli Bhel 1A project was one of the 24 hydro-power Projects stopped by the Supreme Court and the environment clearance of Kotli Bhel 1B project was cancelled by National Environment Appellate Authority, the body before NGT. Kotli Bhel 1B and Kotli Bhel-2 did not get forest clearance form Ministry of Environment, Forest and climate change.
If this committee visited to assess the socio-cultural effect related to minimum water flow in the Ganga and its tributaries, then how come they do it in a haphazard way? In two days only? Where long way to drive.  How come local contractors were well informed? Who all were in the committee, was not clear to the people. People came to know about the committee and there members by newspapers on next day. MOEF&CC is to save the environment but it can’t be seen anywhere.
If any committee inquires local people without prior information, it comes under harassment. This kind of non-serious efforts of MOEF&CC should not be accepted and we will oppose big dams on National River Ganga.
We demand the complete ban on all three Kotli Bhel projects and also cancellation of all 24 Hydro Power Projects Stopped by the Supreme Court. These Projects must be stopped, there is no need of rethinking over this issue.
                
Vimalbhai, Rajendra Negi and Sudershan Sah

Thursday, 25 August 2016

Press Note 25-8-2016
















जून 2013 की त्रासदी के लिये जिम्मेदार जी0वी0के0 बांध कंपनी पर नौ करोड़ का मुआवज़ा व जुर्माना
प्रभावितो ने जीत मनाई/ एन जी टी को धन्यवाद दिया / सरकार से कार्यवाही की अपेक्षा की 

उत्तराखंड में जी0वी0के0 कंपनी के अलकनंदा नदी पर बने श्रीगर बांध के कारण तबाह हुयी संपत्ति के मुआवजें के लिये ‘‘श्रीनगर  बाँध  आपदा  संघर्ष  समिति‘‘  और ‘‘माटू जनसंगठन‘‘ ने अगस्त 2013 में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण में एक याचिका दायर की थी। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने लगभग 18 बार सुनवाई के बाद 19 अगस्त 2016 को उत्तराखंड के लिये ऐतिहासिक फैसला दिया। अपने इस फैसले में माननीय न्यायाधीश यू0 डी0 साल्वी व माननीय विशेषज्ञ सदस्य ए0 आर0 यूसुफ ने जी0वी0के0 कंपनी को जून 2013 आपदा में श्रीनगर में तबाही के लिये जिम्मेदार ठहराते हुये प्रभावितों को 9]26]42]795 करोड़ रुपये का मुआवजा देने व प्रत्येक वादी को एक लाख रुपये देने का आदेश दिया है। 

ज्ञातव्य है कि जी0वी0के0 कंपनी के बांध के कारण  श्रीनगर शहर के शक्तिबिहार] लोअर भक्तियाना] चौहान मौहल्ला] गैस गोदाम] खाद्यान्न गोदाम] एस0एस0बी0] आई0टी0आई0] रेशम फार्म] रोडवेज बस अड्डा] नर्सरी रोड] अलकेश्वर मंदिर] ग्राम सभा उफल्डा के फतेहपुर रेती] श्रीयंत्र टापू रिसोर्ट आदि स्थानों की सरकारी/अर्द्धसरकारी/व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक सम्पत्तियंा बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हुई थी।

‘‘श्रीनगर  बाँध  आपदा  संघर्ष  समिति‘‘  और ‘‘माटू जनसंगठन‘‘ राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के इस जनपक्षीय आदेश का स्वागत करते है। इस आदेश ने सिद्ध किया है कि जून 2013 की त्रासदी में बांधों की बड़ी भूमिका थी। माटू जनसंगठन ने जून 2013 की आपदा में बांधों की भूमिका का मुद्दा हर स्तर पर उठाया था। विधायकांे, सांसदों हर बड़े राजनैतिक दलों को पत्र भेजा था, मिले थे। अफसोस कि सभी इस सवाल पर मौन ही रहे। अब इस आदेश के बाद सरकारें जागेंगी और नदी व लोगो के अधिकारों का हनन करने वाली बांध कंपनियों पर लगाम लगायेंगी। यह आदेश ना केवल उत्तराखंड वरन् देशभर में बांधों के संदर्भ में अपनी तरह का पहला आदेश है। देशभर के बांध प्रभावित क्षेत्रों के लिये यह नया रास्ता दे रहा है। कही भी बांधों के कारण होने वाले नुकसानों के लिये यह आदेश एक नजीर होगा।

प्राधिकरण का आदेशः-

1. प्रतिवादी संख्या 1- अलकनंदा हाइड्रो पावर कंपनी लिमिटेड इस आदेश की तिथि के 30 दिन की अवधि के अंदर सार्वजनिक देयता बीमा अधिनियम] 1991 की धारा 7 (ए) के तहत स्थापित पर्यावरण राहत कोष प्राधिकरण के माध्यम से श्रीनगर शहर में जून] 2013 के बाढ़ पीड़ितों को मुआवजा के तौर पर 9]26]42]795 करोड़ रुपये की राशि जमा करेगी.

2. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (अभ्यास और प्रक्रिया) नियम, 2011 के नियम 12 के तहत, जमा किए जाने वाले मुआवजे की राशि से 1 प्रतिशत राशि कटौती करके कोर्ट फीस के तौर पर रजिस्ट्रार, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को सौंप दिया जाएगा. 

3. प्रतिवादी संख्यां 3 - उत्तराखंड राज्य सरकार, व्यक्तियों के दावे के समर्थन में आवश्यक सबूत के साथ अनुलग्नक ए-5 में संलग्न सूची के अनुसार उनके दावों की सूची की निगरानी के लिए कोई वरिष्ठ उप संभागीय मजिस्ट्रेट को तैनात करने के लिए पौड़ी जिले के जिलाधिकारी को आवश्यक निर्देश जारी करेगी। इसके लिए नियुक्त एसडीएम पेश किए जाने वाले सबूतों के आधार पर दावों को सत्यापित करेगा और दावे की प्रात्रता के आधार पर अनुलग्नक ए-5 की सूची के अनुसार देय कोर्ट फीस की राशि के तौर पर 1 प्रतिशत कटौती करके उस व्यक्ति को सौंपेगा। दावे आमंत्रित करने की घोषणा जिलाधिकारी कार्यालय, श्रीनगर नगरपालिका कार्यालय एवं उत्तराखंड राज्य के वेबसाइट में एक नोटिस प्रकाशित करके की जाएगी। इस नोटिस के प्रकाशन के 90 दिनों के बाद जिलाधिकारी द्वारा नो-क्लेाम (कोई दावा शेष नहीं) दायर किया जाएगा। इस तरह उपरोक्त राशि के वितरण के बाद शेष राशि बाढ़ द्वारा प्रभावित सार्वजनिक संपत्ति की बहाली के उपाय के तौर पर पर्यावरण राहत कोष में उपयोग किया जाएगा.

4. प्रतिवादी संख्या 1 लागत की रकम के रुप में आवेदकों और प्रतिवादी संख्या 4 सहित प्रत्येक को एक-एक लाख रुपए की राशि का भुगतान करेगा।  

5. इस प्रकार 2014 के मूल आवेदन संख्या 3 का निपटारा हो गया है।

प्राधिकरण ने अपने 42 पन्नों के आदेश में बहुत विस्तृत रुप से लिखा है कि जी0वी0के0 कंपनी ने लगातार पर्यावरणीय शर्ताे का उलंघन किया जिसके कारण बाढ़ में बांध की मक तबाही का कारण बनी। विभिन्न रिर्पोटे बताती है कि जहंा मक डाली जाती है वहाँ सुरक्षा दीवार व मक पर पेड़ लगाना, जाली लगाना किया जाना चाहिए। मगर बरसों से नदी किनारे मक रखी गई पर फिर भी उस पर पेड़ नही लगाए गये। प्राधिकरण ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर बनी रवि चोपड़ा समिति की रिर्पोट को भी देखा जिसने मौके पर मुआयना किया था। प्राधिकरण ने बांध कंपनी की इन दलीलो को मानने से इंकार किया कि यह क्षेत्र बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में आता है, यह ईश्वरीय  कारणांे से हुआ।  

मालूम हो की अभी तक राज्य सरकार ने बाढ़ क्षेत्र को परिभाषित नही किया है। 

उत्तराखंड  सरकार  के  वकील  ने  अपना पक्ष रखते हुये पहले  तो  यह  सिद्ध  करने  की  कोशिश  की कि यह  मुक़दमा  सुनने  लायक  ही  नही  क्यूंकी यह  ईश्वरीय  कारणांे  से  हुआ है और  इसमंे जी0वी0के0 कंपनी का कोई  दोष  नही  है। किन्तु प्राधिकरण ने अपने आदेश के पैरा 19 में कहा है कि राज्य सरकार वादियों के, जी0वी0के0 कंपनी को दोषी ठहराने के, कियी तर्क का खंडन नही कर पायी है। 

हम विशेष आभारी है लीगल ‘‘इनीशियेटिव फॅार फॅारेस्ट एण्ंड एन्वायरंमैंट‘‘ के वकील रित्विक दत्ता व वकील राहुल चौधरी जिन्होने बिना फीस लिये इस याचिका पर बहस की। सुनवाई के दौरान दखल  याचिकाकर्ता डॉ. भरत झुनझुनवाला के भी हम आभारी है जिन्होने प्राधिकरण के सामने जी0वी0के0 कंपनी  द्वारा किये गये पर्यावरण शर्तो के उलंघन संबधी सभी तथ्य रखे।

हमारी मांगे 
उत्तराखंड सरकार प्राधिकरण के आदेशानुसार तुरंत पौड़ी के जिलाधिकारी को आवश्यक निर्देश दे। इस तथ्य पर ध्यान दिया जाये कि मुआवजा वितरण की प्रक्रिया बिना भ्रष्टाचार के पूरी हो।

जब यह सिद्ध हो गया है कि श्रीनगर के एक हिस्से में बाढ़ के लिये जी0वी0के0 कंपनी जिम्मेदार है। तो शासन-प्रशासन को तुरंत जी0वी0के0 कंपनी पर आपराधिक कार्यवाही की प्रक्रिया शुरु करनी चाहिये। उसे जानबूझ कर की गई लापरवाहियों के लिये दण्डित किया जाये।  ताकि भविष्य के लिये वे सावधान रहे।

न्यायपालिका ने अपना कार्य पूरा किया है अब शासन-प्रशासन को अपनी भूमिका अदा करते हुये न्याय को लोगो तक पंहुचाना है।

लड़े है! जीते है!!

प्रेम वल्लभ काला]             विजयलक्ष्मी रतूड़ी]  चंद्रमोहन भट्ट]               निर्मला नौटियाल]       विमलभाई

GVK Company held responsible for June 2013 Disaster, fine rupees 9 crore.
Affected people Happy / Gave thanks to NGT/ Hope Government take action accordingly 


On 19th august National Green Tribunal (NGT) after 18 hearings gave a historic verdict on the petition filed in august 2013 by Srinagar Bandh Aapda Sangharsh Samiti and Matu Jansangathan for the compensation against the destruction and damage caused during 2013 disaster because of srinagar dam constructed over Alaknanda river by GVK company Uttrakhand. Hon’ble Justice U.D Salvi, judicial member and Hon’ble Prof. A.R. Yousuf , expert member held GVK company responsible for 2013 disaster and ordered to compensate the affected people with rupees 9,26,42,795 Rs. and 1 lakh per petitionor. 

Srinagar Bandh Aapda Sangharsh Samiti and Matu Jansangathan welcomes NGT’s pro people order. This verdict proved that rapid dam construction is the major reason for 2013 disaster. Matu Jansangathan raised voice on the role of dams  in 2013 disaster at every level including parliament, legislation and famous politicians but unfortunately nobody uttered a word. Now after NGT’s order political parties will control such dam companies who abuses people’s right. This is ever first order by NGT  in the Hydro Power Projects. It will give a new way to the Hydro Power Project affected people.  

Oprative part of NGT’s order  :-

1. Respondent no.1- Alaknanda Hydro Power Co. Ltd. shall deposit an amount of Rs 26,42,795/- by way of compensation to the victims of the June, 2013 floods in city of Srinagar with the Environmental Relief Fund Authority established under Section 7 (a) of Public Liability Insurance Act, 1991 within a period of 30 days from the date of this order.

2. Amount of Court fee payable i.e. 1% of the amount of compensation awarded shall be deducted from the said deposited amount and remitted to the Registrar, National Green Tribunal as per Rule 12 of the National Green Tribunal (Practise and Procedure) Rules, 2011.

3. The respondent no. 3- State of Uttarakhand shall issue necessary directions to the District Magistrate of District Pauri to depute any senior Sub-Divisional Magistrate to call for the claims from the persons as per list annexed as annexure A-5 with necessary proof in support of their claims. The SDM so deputed shall verify the claims made in light of the proofs produced and remit the amount due to such person/s after deduction therefrom the proportionate 1% amount of Court fees payable as per list annexure A-5 on finding the claim to be meritorious. Claims shall be called by publishing a notice, therefor in the office of the District Collector, Srinagar Municipal Corporation and on the website of the State of Uttarakhand. No Claim filed after 90 days of publication of such notice shall be entertained by the District Magistrate. Balance amount remaining in environment relief fund after disbursement of the amount as aforesaid shall be utilised for taking such measures for restoration of the public property affected by the floods.

4. Respondent no.1 shall pay an amount of Rs. 1 lakh each to the applicants as well as the respondent no. 4 as and by way of cost.

5. Original Application no. 3 of 2014 thus stands disposed of. 

The tribunal in its 42 pages order has briefly explained that GVK company has regularly violated the environmental norms which has resulted in flood and devastation of muck. Various reports have also pointed out that walls protecting muck should be built , also plantation and wire fencing should be done around the muck. The muck though put around the river way back but still no plantation has been carried out yet. Tribunal also went through the Ravi Chopra Committee’s report which was constituted by MOEFCC under the dircetion of  Hon’ble Supreme Court of india , the committee has also inspected the area. The tribunal also denied to accept the arguments put forwarded by Dam company that the area comes under flood affected area. Since the State Government has not defined a flood area, therefore what happened in the area was a natural calamity.

Putting forward his argument, the Uttarakhand State public prosecutor first tried to prove that the matter should not be taken into cognizance of court because what happened was a "Act of God" and not negligence on the part of state government or GVK company. The tribunal in its para 19 of the order has said that state government has not been able to deny the argument which held responsible the GVK company for disaster.

We are highly obliged to our advocates, Ritwik Dutta and Rahul Chaudhary who took up this case without charging any fee. We are also grateful to Dr. Bharat Jhunjhunwala , the plaintiff who provided all facts pertaining to environmental conditions violated by GVK company to the tribunal.

Thus we demands:

---According to order issued by NGT,  Uttrakhand state government authority to instruct District Magistrate of Pouri district that the issue of allocation of compensation should be done without corruption.

---When it was proved that GVK Company is responsible for the flood in a particular area of Srinagar then the administration should also take appropriate action and initiate criminal proceedings against it. The GVK Company should be penalized for the offenses committed knowingly to make them alert in the future.

As the judiciary performed its duty likewise the state administration should also take the same route to ensure justice to the people affected.

WE FOUGHT, WE WON!!

Prem Ballabh Kala,          Vijaylaxmi Ratudi,             Chandramohan Bhatt,               Nirmala Noutiyal,          Vimal Bhai.