Sunday, 5 November 2017

Press Note 5-11-2017


पंचेश्वर बांध विरोधी संगठन

                              माटू जनसंगठन                             हिमधारा पर्यावरण समूह   
                             
 <matuganga.blogspot.in>                        <www.himdhara.org>
                                                        झूलाघाट, पिथौरागढ़, उत्तराखंड,
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                                      पंचेश्वर बहुद्देशीय नही बहुधोखीय परियोजना है
                         पंचेश्वर बांध व रुपालीगाड बंाधों की प्रक्रिया तुरंत प्रभाव रोकी जाये।
                                 वन अधिकार दो - जैव विविधता रजिस्टर ग्राम स्तर पर बनाओं

प्रभावित जनता को अंधेरे में रखकर पर्यावरण और वन स्वीकृतियंा लेने की प्रक्रियंा पूरी की जा रही है वह यह बताता है कि सरकारों की मंशा किसी तरह के विकास की नही वरन् मात्र ठेकेदारों की भरण पूर्ति का साधन तैयार किया जा रहा है। पंचेश्वर बहुद्देशीय नही बहुधोखीय परियोजना है

कैसे और कौन से सर्वे के तहत एक पूर्व मुख्यमंत्री ब्यान दे जाते है कि 99 प्रतिशत जनता बांध के पक्ष में है? इससे मालूम होता है कि सरकार फर्जी आकड़ों के आधार पर ही बांध को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। बांध के पक्ष में बिना किसी अध्ययन के दावे और वादे बताते है कि सत्ताधारी दल बांध को चुनाव की तरह से देख रहा है। बस किसी भी तरह से बांध को कानूनी जामा पहनाया जाये और वादे-दावे तो टिहरी बाध्ंा की तरह लटके रहेंगे।
प्रशासन के पास तो मोदी जी के सपने को पूरा करने का दवाब है इसलिये वो अब ‘‘बांध विरोधी संगठनों पर खास नजर रखी जायेगीं‘‘, इस तरह के सरकारी ब्यानों से प्रभावितों को और जनपक्षीय संगठनों को डराने की कोशिश कर रहा है। उत्तराखंड के कुमांउ क्षेत्र की दूरस्थ महाकाली व सरयू घाटी के अतुलनीय सौंदर्य, सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक आस्थाओं, आक्सीजन के भंडार, स्वावलंबी गांव के लोगों को जिन्हे आजादी के बाद से ही सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा व् विकास अन्य लाभों से महरूम रखा गया है उनपर बर्बादी के ये बांध थोपे जा रहे है। हमारा इन दोनो बांधों का पूरी तरह से विरोध है।
हम मात्र भावना ही नही वरन् तार्किक रुप और कानूनी पहलुओं से भी सिद्ध करने में सक्षम है कि यह बांध क्यों गलत है।

चम्पावत जिले में जल्दबाजीः-
पंचेश्वर और रुपालीगाड बंाध चम्पावत जिले में प्रस्तावित है इसलिये इस जिले में इन बांधों से जुड़ी सभी तरह की कानूनी औपचारिकतायें औपचारिक रुप से ही पूरी की जा रही है। जिसका प्रभावितों या पर्यावरण से कोई मतलब नही। सामाजिक आकलन रिर्पोट के आकड़े पुराने और गलत है। गांव वालो को पता तक नही की कब कौन सर्वे करने आया? नये जमाने में गूगल बाबा से जमीनी सर्वे हो गये। इसलिये चम्पावत जिले के सिमलखेत, बौतड़ी, निडिल आदि गांवों में जो सामाजिक आकलन रिर्पोट और तथाकथित पुनर्वास नीति पर बैठके हो रही है उसमें लोग विरोध कर रहे है।

एक नही दो बांध परियोजनायें हैः-
दो बांधों को एक ही परियोजना मान कर 25 अप्रैल 2015 में बांधों के अध्ययन कागजात बनाने के लिये पर्यावरण आकलन समिति ने अनुमति दी। फिर जनसुनवाई भी धोखे से एक में ही करवाई गई।

चम्पावत जिले में ही प्रस्तावित, पंचेश्वर बांध से 27 किलोमीटर नीचे 95 मीटर उंचे कंक्रीट के 240 मेगावाट के रूपालिगाड बांध की जनसुनवाई अलग से होनी चाहिये थी। इसे पंचेश्वर बहुद्देशीय जलविद्युत परियोजना का एक हिस्सा बताकर गलत किया गया है। यह एक बड़ा बांध है जो कि अपने आप में स्वंय एक अलग परियोजना है। इस तरह लोगो के अधिकारो को सीमित किया गया है। यह अपने आप मे एक सबूत है कि पंचेश्वर बहुद्देशीय परियोजना की नींव ही धोखे की है।
बिना जानकारी की धोखे वाली जनसुनवाईयंाः- 9 अगस्त 2017 को चम्पवात, 11 अगस्त 2017 को पिथौरागढ़ और 17 अगस्त 2017 को अल्मोड़ा जिले में हुई जनसुनवाईयंा कानूनी, व्यवहारिक व नैतिक तरह से गलत थी। ये जनसुनवाईयां बिना जानकारी दिये भय, दवाब और भ्रम में पूरी की गई थी।

सामाजिक आंकलन रिर्पोट‘ को रद्द मानों, पुनर्वास के दावे झूठेः-
पुनर्वास के जो दावे किये जा रहे है वो सच्चाई से परे है। आंकड़े कब कैसे कहां से इकटठे किये गये इसका भी कोई जिक्र नही है। बांध के लोगो पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में बनी ‘सामाजिक आंकलन रिर्पोट‘ में एक स्थान पर 2011 का जिक्र है किन्तु प्रत्येक सूची के नीचे सन का कोई जिक्र नही है।  रिपोर्ट में खेती की स्थिति, महिलाओं का अनुपात और उनकी आर्थिक समाजिक स्थिति पर गलत आंकड़े दिये गयंे है। जौलजीबी व झूलाघाट जैसे दो बड़े बाज़ारों व व्यापारियों का भी कोई जिक्र नही है। जबकि यह भारत-नेपाल के बड़े व्यवसायिक केन्द्र है जिन पर हजारों परिवार बरसों से आश्रित है। एक सांस्कृतिक आदान-प्रदान के केन्द्र भी है।

134 गांवों के 29,400 परिवार पंचेश्वर बांध में व रुपालीगाड बंाध में 1,587 परिवार में प्रभावित हो रहे है। ये संख्या बहुत धोखे वाली है। चूंकि जिसके नाम पर जमीन है उसे परिवार माना है। यानि 75 साल के वृद्ध के 4 बेटे और 8 व्यस्क पौत्र है तो भी उनको एक ही परिवार माना गया है। जमीन देने का वादा भी साफ नही है। किसको क्या मिलेगा? कब मिलेगा?

वन अधिकार कानून 2006 कानून का उलंघनः-
बिना वन अधिकार कानून 2006 के अंर्तगत गांव वासियों को वन अधिकार दिये उनसे वन संबधी अनापत्ति ली जा रही है। चम्पावत मे तो यह कार्य 9 अगस्त से पहले ही कर लिया गया। प्रभावितों को मालूम तक नही की  वन अधिकार कानून 2006 उनको पास के जगंल पर अधिकार देता है। आज तक उत्तराखंड में कही पर भी लोगो को वन अधिकार कानून 2006 के तहत मान्यता नही दी गई है।

द बायोलोजिकल डायवसिटी एक्ट 2002 यानि जैविक विविधता कानून 2002 का पालन होः-
द जैविक विविधता कानून 2002 के अनुसार प्रत्येक शहर व  ग्राम, ब्लाक व जिला स्तर पर लोक जैव विविधता रजिस्टर बनाना जरुरी है जिसमें वहंा की जैविक विविधता का पूरा आकड़ा होता है। ताकि गांव की जैव विविधता के पूरे आंकड़े आ सके।  

हमारी मांग है किः-
  1. माना जाये कि यह एक नही दो बांध परियोजनायें थी। जो अब बंद हो रही है।
  2. ये जनसुनवाईयंा ही गैर कानूनी मानी जानी जाये।
  3. सामाजिक आंकलन रिर्पोट‘ को रद्द मानों।
  4. वन अधिकार कानून 2006 के तहत गांवों को अधिकार दिये जाये।
  5. लोक जैव विविधता रजिस्टर ग्राम, ब्लाक व जिला स्तर और नगरपालिका व नगर निगम स्तर पर बनाया जाये।

सुरेन्द्र आर्य, विप्लव भटट्, पी0 सी0 तिवारी, अजंनी कुमारी, हरिवल्लभ भटट्, सुमित महर,

प्रकाश भंडारीविमलभाईहरेन्द्र कुमार अवस्थी

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The Pancheshwar multipurpose is rather multi-delusional project.
The process of the Pancheshwar dam and Rupaligad dam be stopped immediately.
Protect Forest Rights - make Biodiversity Register at village level.


The affected people have been kept in dark and the procurement of environment and forest clearance is being subtly processed which directly construes that the government does not at all have any intention of development, instead creating ways and means of the fulfilment for the contractors. It is more of Pancheshwar multi-delusional rather than Pancheshwar Multipurpose project. 
How and according to which survey a former chief minister gives statement that 99 percent of the people are in favor of the dam? This shows that the government is trying to push the dam only on the basis of spurious data. Claims and promise in favor of the dam without studies show that the ruling party is treating the dam as an election campaign. Just in some way the dam should be put on a legal front and the promises & claims will remain swinging like the Tehri dam.
Administration has the pressure to fulfil the dream of Modi ji hence with the statement “anti-dam organization will be especially monitored”, they are now trying to frighten the affected and pro-people organizations. Incomparable beauty of Sarayu Valley and the Mahakali of Kumaon area of Uttarakhand, cultural heritage, religious beliefs, oxygen reserves and the villagers who have been kept isolated from health services, education and other benefits of development even after independence, are being imposed upon the dam of destruction. We utterly oppose both the dams. 
We are able to prove not only ethically that the dam is unsuitable but also with logic and legal aspect. 

Warfutting work in Champawat district:- The Pancheshwar and the Rupaligad dam are proposed in Champawat district. Therefore, all the legal formalities attached to these dams in the district are being formally completed. Which has nothing to do with the affected and the environment. Data of the Social Impact Assessment Report is outdated and inaccurate. The villagers are not even aware of when who came to survey? As if the ground survey were carried out with the help of Google Baba in the modern technologically developed world. Therefore, the meetings on the Social Impact Assessment Report and so-called rehabilitation policy going on in the villages Simlkhet, Botri, Needle etc. of the Champawat district are being opposed. 

Two dam projects, not one: -Assuming the two dams as a single project, the Environmentl Assessment Committee gave Terms of Reffrence this project on April 25, 2015. Then, public hearing was also deceitfully unified in one. 

There should have been separate public hearing of the 95-meter-high concrete Rupaligad dam of 240 MW below 27 kilometers of the Pancheshwar dam, proposed in the Champwat district itself. This has been done wrong having said it as a part of the Pancheshwar multipurpose hydro power Project. It is a big dam which itself is a separate project. This way, the rights of the people have been curtailed. This itself is an evidence that the foundation of the Pancheshwar multipurpose hydroelectric power project laid on deception.
Deceitful public hearing, Without information: -
The public hearings in Champawat on August 9, 2017, Pithoragarh on August 11, 2017, and in the Almora district on August 17, 2017, was wrong on all ethical, practical and legal ground. The public hearings were completed without informing them in fear, pressure and delusion.
Turn down the 'Social Assessment Report' and false claim of rehabilitation:-
The rehabilitation claims are beyond the reality. There is no mention of how the figures were gathered and from where. There is a mention of the year 2011 at one place in the 'social assessment report' about the effects of the dam on people, but there is no mention of years under each list. In the report, incorrect statistics have been given on the status of agriculture, ratio of women and their socio-economic status. There is no mention of even the two big markets such as Jauljibi and Jhulaghat in the report. whereas these are the major trade centers of Indo-Nepal on which thousands of families are dependent for years. This is also a cultural exchange center.

29,400 families of 134 villages are being affected in the Pancheshwar dam and 1,587 families in the Rupali Gada dam. These numbers are very deceptive. Because only those who had land registered on their name have been considered as a family. Which means, a 75-year-old who has 4 sons and 8 adult grandsons is considered only one family on this equation. The promise of giving land is not clear.
Violation of the forest land act 2006: - Without giving actually the forest rights to the villagers, forest related clearance are being obtained under the Forest Rights Act, 2006. In Champawat district, the task was accomplished even before August 9. The affected people do not even know that the Forest Rights Act 2006 entitle them rights at the nearby forest. Till date, nowhere in Uttarakhand, the people have been recognized under Forest Rights Act 2006.
The Biological Diversity Act 2002 be followed: - According to The Biological Diversity Act 2002, it is necessary to make a public biodiversity register at every town, village, block and district level, in which there would be a complete information of biological diversity of the area. So that the entire bio-diversity of the village can be found.

So, we demand that: -

  1. It is acknowledged that this was two dam projects, not one. Which is now getting closed.
  2. These public hearings should be considered unlawful.
  3. The 'Social Assessment Report' be turned down.
  4. Under the Forest Rights Act 2006 the villages be given rights.
  5. Public Biodiversity Register should be made at village, block, district and municipality level.

Surendra Arya, Viplav Bhatt, P. C. Tiwari, Anjani Kumari, Hari Vallabh Bhatt,

Sumit Mehar, Prakash Bhandari, Vimal Bhai, Hrendra Kumar Awasthi.

Tuesday, 24 October 2017

Press Note 24-10-2017
















जन संगठनों ने पर्यावरण मंत्रालय को घेरा


पंचेश्वर बहुद्देश्यीय परियोजना की प्रक्रियाओं पर उठाये गंभीर प्रश्न

प्रैस विज्ञप्ति:24 अक्तूबर, 2017 | नई दिल्ली: मात्र 6-7 दिन के नोटिस पर पर्यावरण आंकलन समिति ने भारत नेपाल के साझे में उत्तराखंड में प्रस्तावित पंचेश्वर बहुद्देश्यीय परियोजना को अपने एजेंडे में दाखिल किया। 31 मई 2017 से आज 24 अक्टूबर 2017 तक केन्द्र व राज्य सरकारें व सत्तापक्ष के लोग युद्ध स्तर पर प्रभावित गाँवों से लेकर केंद्रीय मंत्रालयों तक मात्र कागज़ी कार्यवाही पूरी करने में लगे हैं। भ्रमित आंकड़ेभ्रमित राजनैतिक वादेमात्र और मात्र पंचेश्वर बांध से विकास की नयी ईमारत लिखने की कवायद की जा रही है।
आज़ादी के बाद से “बाँध आया बाँध आया’’ के शोर में सड़कशिक्षा व स्वास्थ जैसी मूलभूत सुविधाओं से महाकाली घाटी के नदी किनारे के गाँवो को वंचित रखा गया है। अब जब कुछ नयी सड़केंटनकपुर रेलमार्ग आने की उम्मीद जगी तो मोदी साहब का सपना बताकर पंचेश्वर बहुद्देश्यीय परियोजना को तेजी से बढ़ाने की बात तय कर दी गयी।
उत्तराखंड में ही बन चुके टिहरी बाँध से लेकर विष्णुप्रयागविष्णुगाड-पीपलकोटीमनेरीभालीअस्सी-गंगा जैसी तमाम परियोजनाओं के प्रभावित आज भी भूमि आधारित पुनर्वास और मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैंभटक रहे हैं। किन्तु उत्तराखंड सरकार के महकमे अब बोरिया बिस्तर समेट कर पंचेश्वर बाँध की बस में बैठने की तयारी में हैं। अब पुराने बाँध प्रभावितों की समस्याओं पर कोई गंभीर प्रयास नहीं दिखाई दे रहे।
धरने पर आये उत्तराखंड एकता मंच के हर्षित नौटियाल ने पंचेश्वर बाँध को हिमालय की अस्मिता और अस्तित्व पर हमला बताया। हिमालय को युवा पर्वत मानने के बावजूद इतनी बर्बादी क्योहम इसे नही सहेंगे। डी.एस.जी के संजीव कुमार ने कहा की पर्यावरण मंत्रालय के गलत निर्णयों पर आगे बढ़ा आन्दोलन होगा।
माटू जनसंगठन के विमल भाई ने कहा की हमने जुलाई के दुसरे हफ्ते से लगातार तीनो प्रभावित जिलों पिथोरागढ़चम्पावतअल्मोड़ा के जिलाधीशों व सम्बंधित मंत्रालयों को पत्र भेजेव्यक्तिगत मिले लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। वनाधिकार कानून 2006, उत्तराखंड में अभी तक किसी को नहीं मिला!किन्तु मज़े की बात है की चम्पावत जिले में जहाँ दोनों परियोजनाएं प्रस्तावित हैं वहां लोगों से इसके तहत अनाप्त्ति ले ली गयी। पर्यावरणीय जनसुनवाई के लिए न्यूनतम नियम कानूनों का कभी पालन नहीं किया गया। पूरा सरकारी महकमा व सत्तापक्ष के राजनेता सिर्फ बाँध के लाभ बताने में व्यस्त है। बाँध की सही जानकारी देने पर या बड़े बांधो की राजनीती का विरोध करने वाले संगठनो को माओवादी का ठप्पा लगाने की तैयारी है। मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र रावत जी तक इस ओर इशारा कर चुके हैं। केंद्रीय मंत्रालयों में परियोजना में आने वाली तमाम अड़चनों को दूर करके किसी तरह लोगों से अनापत्ति के कागजातों पर हस्ताक्षर लेने के निर्देश दिए गए हैं। धर्म वाली सरकार ने 90 मंदिरों को डूबाने का तो फैसला लिया है साथ बांध के लिये गीता के सामदामदंडभेद की नीतियाँ को भी अख्तियार किया है।
यह बहुद्देश्यय नहीं बल्कि बहुधोकीय परियोजना के रूप में दिखती है क्यूंकि 315 मीउंचे पंचेश्वर बाँध व 95 मीउंचे रुपलिगढ़ बाँधदोनों को एक ही परियोजनाओ को तहत मात्र काम आगे बढाया जा रहा है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा की सत्तापक्ष को आज नहीं तो कल इन सभी सवालों के जवाब देश को देने ही पड़ेंगे।‘‘
मंत्रालय के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ की किसी नदी घाटी परियोजना पर पर्यावरण आंकलन समिति की बैठक के समय लोगो ने प्रदर्शन किया हो। यह मंत्रालय की हठधर्मिता है की मात्र बाँध कंपनियों को ही अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाता है और लोगों की आवाज़ को दबाया जाता है।
हमने समिति को पत्र लिखकर सभी बाते विस्तार पूर्वक बताई थी हमारी आज अपेक्षा थी की पर्यावरण आंकलन समिति हमको बात रखने का मौका देगी इसीलिए पर्यावरण मंत्रालय के बहार प्रतीकात्मक रूप में माटू जनसंगठन के साथउत्तराखंड एकता मंच के साथीजनांदोलनो का राष्ट्रीय समन्वयदिल्ली समर्थक समूह (डी.एस.जीऔर पंचेश्वर बाँध से प्रभावितों ने धरना दिया। किन्तु समिति ने मिलने का समय नहीं दिया।
मात्र 45 मिनट में 40 हजार करोड़ कीउत्तराखंड के जिलो की 12 हजार हेक्टेयर भूमि को डूबोने वालीलगभग 40 हजार परिवारों को प्रभावित करने वाली, 90 मंदिरों को डूबोने वाली इस बांध परियोजना का पर्यावरण आंकलन समिति ने आकलन कर लिया। यह आश्चर्य की बात है।
पर्यावरण आंकलन समिति के किसी भी गलत निर्णयों को हम आगे चुनौती देंगे।

हिमशी सिंह,                                            हरेन्द्र अवस्थी

Saturday, 9 September 2017

प्रेस विज्ञप्ति 9 - 9- 2017


हिमालय दिवस 9 सितंबर का संकल्प ‘‘बांध नहीः सुरक्षित हिमालय‘‘

आईये हिमालय के विनाश के खिलाफ संघर्ष करें

{English after the Hindi Press Note}



‘‘हिमालय दिवस 9 सितंबर‘‘ उत्तराखंड सरकार हिमालय दिवस के लिए इस बार बहुत तैयारी कर के बैठी है और पूरे भारत सरकार ने भी हिमालय दिवस के लिए तैयारियां की है। नरेंद्र मोदी भी आ रहे हैं। मात्र हिमालय दिवस मनाने से ही हिमालय की सुरक्षा नहीं होगी। बल्कि हिमालय की पीड़ा को समझना ज्यादा जरूरी होगा। आज हिमालय किन कारणों से पीड़ित है आइए उनकी विवेचना करें। हिमालय अगर पीडित है तो वह है विकास से। इस कथाकथित विकास ने हिमालय को भेद कर रख दिया है। इन विकास कार्यों में हजारों बल्कि लाखों एकड़ जंगल खत्म कर दिया गया हैं। सडकों में, बांधों में और अन्य कार्यों में; और जो बचा खुचा जंगल है भी उस पर भी वन विभाग की कृपा से विनाश हो ही रहा है।
हिमालय के मूल तत्व है बर्फ, नदियंा व जंगल और इसके रक्षक है यहंा के निवासी। पूरे हिमालय में नीचे हरा आवरण और ऊपर नीचे श्वेत धवल बर्फ का आवरण। बर्फ का आवरण हिमालय के पूरे स्वास्थ्य का रक्षक ही है। बर्फ का होना और वृक्षों से आच्छादित होना पूरे हिमालय के लिए दो जरूरी बातें रहीं। जैसे-जैसे हमने विकास योजनाओं को हिमालय में तरजीह दी है वैसे-वैसे ही हिमालय में ग्लेशियर का नीचे होना शुरू हुआ है, जंगलों का कटान हुई है। बांध बनने से बादलों का फटना ज्यादा हुआ है। टिहरी बांध बनने के बाद बादल फटने की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई है।
बड़ी चौड़ी सड़को के बनने के कारण से भूस्खलन बढे हैं। जहां पर भी सड़के चौड़ी हुई हैं वहां पर ज्यादा विस्फोटकों का इस्तेमाल होता है, जिस कारण से सड़क बनने के थोड़े ही समय बाद भूस्खलन चालू हो जाते हैं। विस्फोटों के बहुत ज़्यादा इस्तेमाल के कारण से हिमालय कमज़ोर हो रहा है। जहाँ-जहाँ चौड़ी सड़कें, वहां-वहां पर तथाकथित विकास की बड़ी योजनाएँ जिसमे ये बड़े बांधों आदि ने तो हिमालय को बहुत ही नुकसान पहंुचाया है। ये सरकारें इस बात को क्यों नहीं समझती हैं?
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र रावत जी ने 15 अगस्त को राज्य के सभी लोगों से एक पेड़ लगाने का संकल्प लेने के लिए कहा था। दूसरी तरफ बांधो में तो हजारो लाखों हेक्टेयर जंगल सीधे ही डूब रहा है।
अभी अगस्त महीने ही में पंचेश्वर बांध की जनसुनवाईयाँ जिस तरह हुई हैं उसमें पूरी तरह हिमालय के हक़ को नाकारा गया है। सरकारें बांध विकास के नाम पर ला रही हैं, दूसरी तरफ हिमालय के रक्षण की बात करते हैं। एक पेड़ लगाने की बात करते हैं दुसरी तरफ हजारों हेक्टेयर जंगल डूबा रहे हैं, बर्बाद कर रहे हैं। तो ये कथनी और करनी का अंतर मालूम पड़ता है।
नदियंा हिमालय की बेटियंा है। हम सरकारों को यह फिर से याद दिलाना चाहेंगे की जून 2013 के समय शायद ही कोई बांध बचा था जिसपर नदियों ने अपना प्रकोप नहीं दिखाया था। नदियां खास कर गंगा, बांधों को तोड़ कर आगे बढ़ी थी और बांधों के कारण से जहाँ-जहाँ गंगा का प्रवाह रुका वहां-वहां तबाही और हुई। बांधों के निर्माण में विस्फोटकों के इस्तेमाल के कारण भूस्खलन उन क्षेत्रों में ज़्यादा हुए। हमने हमेशा ही इस बात को सरकारों के सामने रखा है किन्तु अफ़सोस है की आजतक गंगा को माँ मानने वाली सरकार और अब जिसे डबल इंजन की सरकार कहा जा रहा है, वो भी इस मामले में पूरी तरह मौन ही नहीं अपितु उसके खिलाफ काम कर रही है।
नदियों में खनन को जिस तरह से बढ़ाया जा रहा है, जिस तरह रोज़गार के नाम पर खनन खोलने की बात हुई वो भी गलत है। चूँकि खनन रोज़गार नहीं। हाँ चँद ठेकेदारों के लिए फायदा देता है। हमने सरकारों को कहा है की टिहरी बांध में और दूसरे बांधों में भी जैसे विष्णुप्रयाग बांध के जलाशय में बहुत सारा मलबा, बहुत सारी रेत भरी पड़ी है। यदि यह रेत निकली जाये तो इससे टिहरी बांध का जलाशय खाली हो पाएगा और पानी भी ज़्यादा भर पाएगा। किन्तु ऐसा न करके, मात्र हरिद्वार और नीचे के क्षेत्रों में खनन को ज़्यादा बढ़ाने की बात हुई है।
हिमालय दिवस के इस शुभ अवसर पर हम केंद्र व राज्य सरकारों मांग करते हैं की वे हिमालय की इन पीड़ाओं को पहले समझे और उसके अनुसार ही विकास की नीतियों को बदले। बड़े बांधो से मात्र थोड़ी बिजली ज़रूर मिलेगी मगर तबाही की ज़्यादा हुई।
हिमायल दिवस पर सरकारें टिहरी बांध जैसी गलती ना दोहराने का संकल्प ले। पंचेश्वर बहूद्देशीय बांध परियोजना को वापिस ले।

विमलभाई, पूरण सिंह राना, राजपाल रावत, प्रहलाद सिंह, रामलाल, राजेन्द्र सिंह नेगी, सुर्दशन साह, दिनेश चौहान, बृहराज तड़ियाल
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Himalaya Diwas” 9th September 

“No to DAM : Safe Himalayas”
 
Lets fight agaist distruction fo Himalaya

Himalaya Diwas” 9th September, the government of Uttarakhand has prepared lot for the Himalaya da, this time central government of India has also made preparations for the Day. Narendra Modi is also coming. A mere celebration of the Himalaya Day will not save the Himalayas rather it would be more important to understand the grief of the Himalayas. What is the cause of concern for the Himalayas today, let us understand that. Today Himalaya is threatened by so called development activites. This so-called development has pierced the Himalayas. Thousands and millions of acres of forest have been destructed in these development works, building roads, constructing dams and in other works; And the remaining forest is also being destroyed by the grace of the forest department.
The basic element of the Himalayas are the snow, rivers, and forest and its protector is the inhabitants of there. The green cover beneath the entire Himalayas and the white snow cover above the top. The snow cover is the protector of the entire health of the Himalayas. Having snow and covered with trees, have been the two important things for the Himalayas. As we have expedited development plans in the Himalayas, the glacier has started melting in the region and the forests have also been recklessly cut down. The formation of a dam has caused clouds to burst. Cloud burst incidents have increased rapidly after the construction of the Tehri Dam.
The landslides have increased due to the formation of large widened roads. Wherever the roads are widened, more explosives are used, due to which landslide begins soon after the construction of roads. Himalaya is becoming vulnerable due to the excessive use of explosives. Wherever large and widened roads there and colossal projects of so-called development, in which these big dams etc. are included, have caused havoc to the Himalayas. Why do the government not understand it?
Chief Minister of Uttarakhand, Mr. Trivendra Rawat, had asked people of the state on 15 August to take a resolution to plant at least one tree. On the other side, thousands of millions of hectares of forest are submerged directly.
The rights of the Himalayas have been totally denied in the way that the public hearings of the Pancheseshwar Multipurpose Dam have taken place recently in the month of August. Governments are bringing the dam in the name of development, on the other hand, they talk about protection of the Himalayas. On one hand, they talk about planting a tree, on the other hand, thousands of hectares of forests are submerged. So, it seems the difference between their words and action.
Rivers are daughters of the Himalayas. We would like to remind the governments again that there was hardly any dam which the rivers did not show their outbreak during the June 2013. The rivers, especially the Ganges, went ahead by breaking the dams and wherever the dams hindered the flow of the river, it was more destructions over there. Because of the use of explosives in the construction of dams, landslides were recorded more in those areas. We have always kept the matter in front of the governments, but regretfully the government believing Ganges as the mother so far, which is now also being called the government of double engine, is not totally silent in the matter but is working against.
The way the mining is being extended in the rivers and the way the mining was done in the name of employment, they are all absolutely wrong. Because mining is not employment. Yes, only a few contractors get benefitted. We have told the government that in the Tehri Dam and other dams, a lot of debris and sand lying, like in the reservoir of Vishnupraya dam. If this sand is released, then the reservoir of Tehri Dam will be empty and it will also be able to store more water. But leaving it aside, there has been a talk of increasing mining in Haridwar and the areas below.
On this auspicious occasion of Himalaya Day, we demand the Central and the State Governments to first understand the grief of the Himalayas and change the policies of development accordingly. Of course, a little bit of electricity will be generated from the big dams, but devastation will be more than that.
On the Himalaya’s day, the governments may resolve not to repeat the mistake like Tehri dam. And take the Pancheshwar multi-purpose hydro power project back.

Vimalbhai, Puran Singh Rana, Rajpal Rawat, Prahlad Singh, Ramlal,
Rajendra Negi, Sudershan Shah, Dinesh Chowhan, Briharshraj Tadiyal

Monday, 21 August 2017

PN - 18-8-2017


पंचेश्वर बांध की जनसुनवाईयां छल-बल राजनैतिक दवाब में पूरी की गई

प्रभावित जनता के साथ धोखा रही!

उत्तराखंड के कुंमाऊ क्षेत्र में 311 मीटर ऊँचे पंचेश्वर बांध की 9, 11 17 अगस्त को चम्पावत, पिथौरागढ़ अल्मोड़ा जिलो में हुई जनसुनवाईयां छल-बल राजनैतिक दवाब में पूरी की गई है। सत्ताधारी दल के लोगो ने पूरी तरह से मंचों पर कब्जा रखा। जनसुनवाई की स्वतंत्र प्रक्रिया को हर जगह बाधित किया। प्रषासन भी पूरी तरह दवाब में रहा। 
हम तीनों जिलों के जिलाधिकारियों, श्री रविशंकर जी, पिथौरागढ़ 24-7-2017 को; श्री इकबाल अहमद जी, चम्पावत को 25-7-2017 श्रीमति आशीष जी, अल्मोड़ा को 3-7-2017 को मिले थे। हमने सभी जिलाधिकारियों को 14-09-2006 की अधिसूचना के बारे में विस्तार से बताया, कानूनी व्यवहारिक समस्याओं के बारे में भी बताया। हमने निवेदन किया था कि वे प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में सदस्य सचिव को भी इन परिस्थितियों से अवगत कराएंगे। अधिसूचना के अनुसार राज्य प्रदूषण बोर्ड का सचिव, जिलाधीष की सिफारिष पर जनसुनवाई की तारिख समय स्थान बदल सकता है। किन्तु तीनों की जिलाधीषों ने जमीनी सच्चाई को पूरी तरह से नकार कर मात्र जनसुनवाईयों की कागजी प्रक्रिया पूरी की। 9-8-217 को चम्पावत, 11-8-2017 को पिथौरागढ़ 17.8.2017 को अल्मोड़ा में हुई जनसुनवाईयों में यह बहुत साफ तरह से आया है।
हम सभी जिलो के अनेक गांवों में होकर आये है। हमने पाया की जनसुनवाई की जानकारी बस एक हवा की तरह उन्हे मिली है। कही पटवारी ने ग्राम प्रधान को फोन करके बताया है तो कही लोगो को अखबार से खबर मिली है। किसी भी प्रभावित ग्राम प्रधान को अधिकारिक रुप से एक महिना पहले ना तो जनसुनवाई की कोई जानकारी दी गई, ना ही जनसुनवाई की सूचना का पत्र गया। चम्पावत जिले में प्रभावित ग्राम प्रधानों से 30 जुलाई के बाद जिला ब्लाॅक कार्यालय में एक ही पत्र पर हस्ताक्षर लिये गये है।
अल्मोड़ा, चम्पावत पिथौरागढ़ जिलो में स्थिति एक ही जैसी रही। बाँध प्रभावित क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ सेवाओं की स्थिति निम्न स्तर पर है। ऐसे में प्रभावित क्षेत्र के लोगों से आप ये कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि अंग्रेजी में लिखी गई पर्यावरण प्रभाव आकलन, समाजिक प्रभाव आकलन प्रबंध योजना रिपोर्टो पर कम शिक्षित या अनपढ़ लोग, जिनके पास अख़बार भी नहीं पहुँचता वे पर अपनी राय देंगे?
तेज बारिष का समय था। प्रषासन ने स्कूलो की छुट्टी का निर्देष दे रखा था। जनसुनवाई स्थल से गांव बहुत ही दूर रखे गये। प्रभावितों को कई किलोमीटर की लम्बी चढ़ाई चढ़कर सड़क पर पहुचना हुआ, फिर जीप आदि में पैसा खर्च करके वे जनसुनवाई स्थल तक कुछ ही गंावों के कुछ ही लोग पहुंच पाये।
चम्पावत पिथौरागढ़ की जनसुनवाई के मंच पर ये नही मालूम पड़ा की जनसुनवाई का पैनल कौन सा है ? मंचों पर स्थानीय विधायक, ब्लाक प्रमुख तथा सांसद प्रतिनिधी मौजूद थे। जनसुनवाई में प्रभावितों ने पुनर्वास के बहुत सतही प्रश्न उठाये। मंचासीन लोगो ने बार-बार पुर्नवास के जुड़ी बातों को दोहराया आश्वासन दिये जिसका जनसुनवाई से कोई मतलब नही था। एक प्रकार से यह लोगो पर एक दवाब लाने की कोशिश थी। पुर्नवास के संदर्भ में भरोसे का भ्रम पैदा करने की कोशिश थी। जनसुनवाई बन्द हाल में हुई। मंच से यह भी कहॉ गया कि जो बात दे वो बाहर जाए। बाहर टी0वी0 लगाकर लोगो को बस देखने सुनने का मौका दिया गया। किन्तु अन्दर की सारी कार्यवाही कैमरे पर नही थी।
पीएसी, स्थानीय अन्य तरह की पुलिस के महिला पुरुष जवान काफी संख्या में तीनों ही जनसुनवाईयों में थे। ऐसा लग रहा था की किसी बहुमूल्य वस्तु की निलामी प्रक्रिया हो रही हो। जनसुनवाई के हॉल में भी पुलिस अधिकारी मौजूद रहे। जो बोलने वालों को नियंत्रण में रख रहे थे।
सत्तापक्ष के विधायकों उनके अन्य साथियों को बार-बार देर तक बिना किसी समय सीमा के बोलने दिया गया। जबकि जनसंगठनों के लोगो को बात रखने पर रोका- टोका और धमकाया तक गया।
अल्मोड़ा की जनसुनवाई में वरिष्ठ समाजकर्मी राजीव लोचन षाह को उपजिलाधिकारी ने सत्तापक्ष के लोगो के साथ बलपूर्वक रोका माईक तक छीन लिया। जबकि जिलाधिकारी ने कहा था कि हम सबको सुनेंगे चाहे वो अमेरिका से ही क्यों ना आया हो। जिलाधिकारी जनसुनवाई पैनल की अध्ययक्ष थी।
जनसुनवाई क्या होती है? जनसुनवाई से पहलेे क्या होता है? इस प्रक्रिया तक का प्रभावितों को नही मालूम था। पर्यावरण प्रभाव आकलन, समाजिक प्रभाव आकलन प्रबंध योजना रिपोर्टो उनके सार संक्षेप जैसे शब्द तक का प्रभावितों को नही मालूम थे। फिर गंावों में इन कागजातो के सार संक्षेप मिलने का तो प्रश्न ही नही होता। बिना सही और पूरी जानकारी प्राप्त किये, बिना ये समझे कि बांध से क्या होगा? पर्यावरण पर क्या होने वाला है? विस्थापन क्या होगा? पुर्नवास क्या होगा? सरकारों ने आज तक क्या किया है? मात्र और मात्र बड़े आकडे़ और बड़ी धनराशि और बड़े सपनों को दिखाने का और जनसुनवाई का कागजी काम पूरा किया गया।
किसी भी परियोजना की जनसुनवाई ही एक मात्र मंच होता है जहां वे सारी जानकारी प्राप्त करके इस पर अपनी राय रख सकते है। इस प्रक्रिया का पूरी तरह से उलंघन हुआ है। लोकतांत्रिक मूल्य  इस नदी घाटी के लोगो पर्यावरण के साथ धोखा सिद्व हुई।
हमारी पुनः ये मांग है कि इस सब परिस्थितियों में जनहित, पर्यावरण हित और राज्य के दीर्घकालीन हितों के लिये यह आवश्यक है कि सही प्रक्रिया का पालन करते हुये-
1. चम्पावत में 9-8-2017, पिथौरागढ़ में 11.8.2017 अल्मोड़ा में 17.8.2017 को हुई जनसुनवाईयां की जनसुनवाई स्थगित मानी जाये।
2. पर्यावरण प्रभाव आकलन, समाजिक प्रभाव आकलन प्रबंध योजना रिपोर्टे सरल हिंदी में प्रभावितों को समझायी जाए जिसके लिए पर्यावरण सामजिक क्षेत्र में काम करने वाली निष्पक्ष संस्था को जिम्मेदारी दी जाए।
3. अगली जन सुनवाईयों के स्थल बाँध प्रभावित क्षेत्रों में ही रखी जाएँ।
4. जनसुनवाईयंो का समय मानसून के बाद का ही होना चाहिए।
5. जनसुनवाईयों में पुलिस का प्रयोग ना हो पैनल पर सिर्फ पैनल के ही लोग बैठे।
6. चम्पावत की जनसुनवाई में दुर्वयव्हार करने वाले अधिकारियों पर कार्यवाही हो।
7. निष्पक्ष स्वतंत्र रुप से जनसुनवाई हो सके यह सुनिष्चित किया जाये।

विमलभाई                                                            सुमित महर
माटू जन संगठन                                           हिम धारा पर्यावरण समूह